मंगळवार, १७ जुलै, २०१८

निरंतर चलनेवाली जीवमान प्रक्रिया है `धर्म'

हम सब मनुष्य है. सुख-दुख, आनंद और अवसाद, आशा और हताशा ऐसी अनेकानेक भावनाओं का अनुभव करते है. उनको व्यक्त भी करते है. इन भावनाओं को अनुकूल बनाने का प्रयास भी करते है. हमारी कई जरूरते होती है. हम उन्हें पुरा करने की कोशीश करते है. वह पुरी होती है तब समाधान होता है और नहीं होती तब कुंठा का अनुभव करते है. भावनाओं और जरूरतों की इस आबाधाबी में हमें स्वयं की और औरो की आवश्यकता होती है. हम स्वयं को स्वयं के साथ और स्वयं को औरो के साथ जुड़ा हुआ और पूरक देखना चाहते है. हम अगर स्वयं के साथ अथवा औरो के साथ बिखराव का अनुभव करते है तो कुछ भी करने में असमर्थ हो जाते है. यह असमर्थता केवल शारीरिक कृति के संबंध मे ही नहीं, अपितु मानसिक, बौद्धिक, आर्थिक, पारिवारिक, सामाजिक कृति के संबंध में भी दिखाई देने लगती है. इस प्रकार का बिखराव ना हो और कर्मों में असमर्थता ना उत्पन्न हो इस दृष्टी से `समाज’ नामक व्यवस्था का विकास हुआ. यह व्यवस्था सुचारू रूप से चलनी चाहिए. यह अनिवार्य है. घोर व्यक्तिवादी मनुष्य भी समाज और उसका सुचारू रूप से चलना आवश्यक मानता है. आज हम ऐसे घोर व्यक्तिवादी बहुत बड़ी मात्रा में देखते है. व्यक्तिवाद, व्यक्तिस्वतंत्रता, मै यही उनका विचार होता है. लेकिन उन्हें भी अपेक्षा होती ही है की- दूरभाष ठीक चले, रेलगाड़ियाँ अच्छी हो और समय पर चलें, कचरे के ढेर साफ होते रहे, बाजारों में सबकुछ उपलब्ध हो और दाम भी योग्य रहें, चैन से सो सके, अपने घर में चोरी न हो, हमारा जीवन सुरक्षित रहे, हम चाहे जितना शोर मचाये लेकिन हम चाहे तब शांति रहे. ऐसी कई बातें गिनाई जा सकती है. इसमें जिन बातो की अपेक्षा करते है उसे ये लोग अपना अधिकार मानते है. और जिनके सहारे ये अपेक्षाएं पूर्ण हो सकती है उनका इन अपेक्षाओं को पूर्ण करना यह उनका कर्तव्य मानते है. जिनसे अपेक्षा की जाती है वह अगर कहें की, आपकी अपेक्षाओं को पूर्ण करना मेरा कर्तव्य नहीं है; या यूँ कहें की- मेरे कर्तव्य का निर्धारण करनेवाले आप कौन हो, मै खुद तय करूँगा मेरा कर्तव्य क्या है, या फिर यूँ की- मेरे भी कुछ अधिकार है और उसे मै प्राथमिकता और प्रधानता दूंगा. इस स्थिति का समाधान क्या होगा और समाधान कौन निकालेगा? यह तो अजीबोगरीब परिस्थिति उत्पन्न होगी. इस स्थिति में काम नहीं चलेगा. आज हम कभी कभी इस स्थिति का अनुभव व्यक्तिगत और सामाजिक दोनों स्तरों पर करते है.

कानून और नियम बनाकर इस स्थिति का समाधान खोजने की कोशीश अक्सर की जाती है. यह कानून और नियम भंग करके अव्यवस्था उत्पन्न ना हो इसलिए न्यायव्यवस्था और दंडविधान का प्रावधान होता है. किन्तु यह कानून और नियम भी औरों का विचार किये बगैर तथा औरों के प्रति सहानुभूति के बगैर ना तो बनाएँ जा सकते है ना उनका पालन और क्रियान्वयन हो सकता है. दो वर्ष पूर्व भ्रष्टाचार के खिलाफ जो महाआंदोलन हुआ वह इस बात का जीताजागता उदहारण है. कितना बड़ा आंदोलन हुआ, बड़ी मात्रा में जागृति भी हुई, सारी संसद ने विशेष अधिवेशन बुलाकर एक आवाज में भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी प्रतिबद्धता जताई और कानून बनाने का संकल्प भी किया. लेकिन अभी तक कानून नहीं बन पाया. अन्यही ऐसे कई उदहारण देखने को मिलते है. दागी जनप्रतिनिधियों के संबंध में या राजनीतिक पार्टियों को सूचना कानून के अंतर्गत लाने के संबंध में तो कानून तैयार करनेवाली व्यवस्था और उसके सुयोग्य क्रियान्वयन की देखरेख करनेवाली व्यवस्था आमनेसामने खडी हो गयी है. दो संरचनाओं ने मिलकर समाज को एकसाथ रखने की और चलाने की जिनकी जिम्मेवारी है उनमे ही जुड़ाव और पूरकता की जगह अगर टकराव और बिखराव रहता है तो समाज का क्या होगा?

मानवी जीवन के कई पहलुओं में इस प्रकार की स्थिति देखने को मिलती है. चिकित्सक और रोगी में टकराव, महिला और पुरुष में टकराव, अमिर और गरीब में टकराव, शिक्षार्थी और अध्यापकों में टकराव, शासन और प्रशासन में टकराव, गावों और शहरों में टकराव, कृषि और उद्योगों में टकराव, विज्ञानं और अध्यात्म में टकराव. ऐसा क्यूँ होता है? एक तो आपसी विश्वास का अभाव और दुसरा अपने अधिकारों का आग्रह. विश्वास यह एक वस्तु नहीं, एक प्रक्रिया है. उसके भी आगे वह chain reaction है. प्रारंभ में विश्वास रखना पड़ता है. उसके लिए आत्मविश्वास और धैर्य की जरुरत होती है. उसके बाद जिस पर विश्वास रखा गया उसकी ये जिम्मेवारी होती है की वह विश्वास तोड़ने के बजाय उसे सार्थ बनाएँ. फिर विश्वास बढ़ता है. दुसरी बार थोड़ी सहजता से विश्वास रख सकते है. इसी प्रक्रिया से विश्वास बढ़ता और सशक्त होता जाता है. यह प्रक्रिया रूकती नहीं है, वह आखिर तक चलती रहनी चाहियें; यह उस प्रक्रिया की विशेषता है. इसके विपरीत अगर होता है तो विश्वास ख़त्म हो जाता है. उसे फिर उत्पन्न करने की भी यही प्रक्रिया है. उसे फिर से प्रारंभ करना पड़ता है. इस प्रक्रिया में दोनों पक्षों की सहभागिता अनिवार्य है. लेकिन फिर प्रश्न उत्पन्न होता है की, विश्वास क्यूँ रखा जाएँ और उस विश्वास को क्यूँ निभाया जाएँ? जब तक दोनों पक्षों को एक दुसरे के प्रति स्नेह और लगाव नहीं लगता, विश्वास की यह प्रक्रिया प्रारंभ ही नहीं होती. अधिकारों के आग्रह के संबंध में भी यही निष्कर्ष निकालना पड़ता है की, जब तक `मै’ की बजाय `हम’ का अनुभव नहीं होता तब तक अधिकारों की ही बात चलती है. बाकि तो छोड़ दीजियें, मातापिता या परिवार का कोई सदस्य अगर अधिकारों की बात करते है तो परिवार में अशांति उत्पन्न होना अवश्य है. अधिकार और कर्तव्य की यह प्रक्रिया भी दोनों पक्षों की सहभागिता चाहती है. हर किसी को इस बात का ध्यान रखना चाहिए की दुसरे के अधिकार की रक्षा हो रही है या नहीं. अधिकार नाम की बात गलत नहीं है. लेकिन उसका ख्याल रखने की जिम्मेवारी स्वयं की नहीं दूसरों की है. जब वह जिम्मेवारी नहीं निभाई जाती तब टकराव उत्पन्न होता है. प्रश्न फिर वही उत्पन्न होता है की, दूसरों के अधिकार की रक्षा का ध्यान मै क्यूँ रखू? यह प्रक्रिया भी अंत तक चलनी चाहिए लेकिन, आपसी एकत्व की अनुभूति के अभाव में वह नहीं हो पाता.

विश्वास और अधिकार रक्षा के लिए जो एकत्व की अनुभूति चाहिए, वह कैसे हो यह मूल प्रश्न है. दैनंदिन जीवन मे, रोज के कामो मे तो एकत्व की जगह विभिन्नताही दिखाई पडती है. हरेक का रुपरंग तो अलग है ही, साथ साथ जरुरते- आदते- विचार- bhavanayeभावनाएं- अपेक्षाएं- रुचियाँ- खामियाँ- कौशल- सब कुछ अलग अलग है. अगर कहीं कुछ मेल खा जाता है तो उस बातों में स्तर विभिन्न है. लेकिन यह विभिन्नताएं बाह्य प्रकृति का लक्षण है. सब प्रकार की विविधताओं के बिच भी आंतर प्रकृति में एकताही अनुभूत होती है. उसमे भी एक अजीब बात है. आंतर प्रकृति की दुख, वेदना, अभाव, त्रासदी अन्याय यह बातें एकत्व का अहसास कराती है. लेकिन सुख, आनंद, उल्लास आदि बातें एकत्व के स्थान पर ईर्ष्या, द्वेष, ऊँचनिचता ऐसे भाव पैदा करती है. एकत्व उत्पन्न करने के लिए भी प्रयास किये जाते है. उसका थोडाबहुत परिणाम तो होता है. किन्तु स्थायी और आश्वस्त करनेवाला परिणाम कम होता है. इसीलिए हम देखते है की, त्यौहारों में लोग एकत्र आते है, घुमने फिरने जाते है, खातेपिते है, एकदूसरे की कुछ मदद भी कर लेते है. लेकिन इतना सब होने के बाद भी आपस में झगड़े, टकराव, मनमुटाव, पीठ पीछे बातें करना, एक दुसरे की टांग खींचना, आपस में टांग अडाना यह भी होता है. कई बार बहुत घुलेमिले लोग भी बिखर जाते है. रिश्तेनाते, दोस्ती टूट जाती है. इतनाही नहीं इसमें से बड़ी मात्रा में कटुता भी उत्पन्न होती है.

इस पुरे विश्लेषण को हम संक्षेप में यूँ रख सकते है- आपसी एकत्व की अनुभूति के अभाव में संसार में सब कुछ या तो रुक जाएगा, या फिर अव्यवस्था की स्थिति होगी. एकत्व की अनुभूति जितनी मात्रा में हो उतनी मात्रा में मनुष्य जीवन सुचारू रूप से चलेगा. उतनी मात्रा में सुख-शांति का अनुभव होगा. लेकिन सहजता से होनेवाला अनुभव तो भेदों का ही है. एकत्व उत्पन्न करनेवाले प्रयासों का परिणाम भी अपेक्षाकृत नहीं है. तो फिर प्रश्न उत्पन्न होता है की, सुख-शांतिपूर्ण मनुष्य जीवन के लिए अपरिहार्य इस प्रकार की इस एकता का अहसास कैसे होगा? हिन्दू चिंतन यह कहता है की, यह एकता उत्पन्न करने की आवश्यकता ही नहीं है. यह एकताही विद्यमान है. विभिन्न चीजों को एक करने के प्रयास विफल होंगे ही. अगर चीजे अलग अलग है तो उसमे एकत्व नहीं हो सकता. हमें एकत्व की चाह है, उसकी धुंदली ही क्यों न हो, लेकिन अनुभूति के बगैर हम जी ही नहीं सकते. बस बात तो केवल इतनी है की किसी अनजाने कारण से हम इस एकत्व को भूल गए है. हमें उसे फिर से केवल मन में जगाना है.

एकत्व कहते ही हमारे मन में कुछ विशिष्ट चित्र उत्पन्न होता है. सब लोग एक जैसा पहनावा करें, सब लोग एक साथ खाएं, सब लोग एक साथ रहें, सब लोग एकही बोली बोलेन, सब लोग समान रूप से सोचें, सब लोग समान रूप से उपासना करें, स्वयं की रूचि- अरुचि- जरूरतें- इनका बलिदान करें. इसमें होता यह है की, जो लोग प्रभावशाली है, ताकतवर है उनकी ही बात सब पर लागु होती है और वह बात सब के मन की भावना के रूप में प्रस्तुत की जाती है. हर कोई स्वयं में उसके अनुसार परिवर्तन करें ऐसी अपेक्षा की जाती है. एकत्व की जो भी प्रमाणिक बात होती है या एकत्व के जो भी प्रामाणिक प्रयास होते है उनमे अधिकतर इसी बात को देखा जा सकता है. हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था इसका एक उदहारण है. हमारी कुटुंब व्यवस्था में भी यही देखने को मिलता है. उदाहरण के तौर पर सब लोगों के साथ अधिक से अधिक समय बिताने की बात को लें. जो प्रतिभावान लोग होते है, साहित्यिक या कलाकार होते है, लेखक होते है, वैज्ञानिक होते है, साधक होते है; उनकी अपनी अलग जरूरतें होती है. सब के साथ जादा समय बिताने के बजाय एकांत में समय बिताना उनकी जरुरत होती है. या फिर पत्नी को इच्छा हो सकती है की पति अधिक समय अपने साथ बिताएं, रोज घुमाने ले जाएँ या साथ घुमने चलें आदि. लेकिन व्यक्ति के संपूर्ण विकास के लिए क्या यह पूरक हो सकता है? किसी कला या साहित्य से खुद को जोडना, बगीचे में या खेती में काम करना, साधना करना, सामाजिक कामों में भाग लेना ऐसी चीजों के लिए समय व्यतीत करना क्या गलत है? लेकिन ऐसी बातों पर झगडे होते है. तो, कभी कभी व्यक्तिवाद के अतिरेक के कारण मेल बिठाना मुश्किल होता है और कभी कभी व्यक्ति के न्यायपूर्ण जरूरतों को दबाने की स्थिति उत्पन्न होती है.

इस दुविधा से निपटने के लिए हमें एकत्व के सही अर्थ को समझना पडेगा. एकत्व का सही आशय है आंतरिक  एकत्व. एकत्व यह मनुष्य के अंतर का भाव है. उसे बाहरी रूपों या गुणों पर थोपना गलत होगा. जब तक हम बाहर की बातें ही देखते और सोचते रहेंगे तब तक आंतरिक एकता की अनुभूति हम से दूर भागेगी. इसके दो अर्थ है- स्वयं के बारें में स्वयं की दृष्टी से सोचना और दूसरों के बारें में उन्ही की दृष्टी से सोचना. अर्थात- मुझे अगर पुस्तक पढने में रूचि है, या उस में मै रमता हूँ, वह मेरी जरुरत है तो मुझे उसी तरह से सोचना और व्यवहार करना चाहिए. और लोग पुस्तक पढने के विषय में या मेरे पुस्तक पढने के विषय में क्या सोचते है इसका विचार करने की आवश्यकता नहीं. लेकिन साथ ही कोई और अगर खानेपीने में आनंद का अनुभव करता है तो, मुझे उसका आदर करना चाहिए. मै अपना पुस्तक बाजु में रख दूँ यह दुसरे का आग्रह, या दूसरा अपना खानापीना दूर रखे यह मेरा आग्रह; यह दोनों बातें गलत कहनी पडेगी. स्वयं के और दूसरों के अंतर के बारें में सोचना इसके लिए आवश्यक है. यही है आध्यात्मिकता. भगवान के बारे में सोचना यह आध्यात्मिकता नहीं है. स्वयं के और दूसरों के अंतर के बारे में सोचने में, समझने में जहाँ तक भगवान की सहायता होती है, स्वागतयोग्य है. अन्यथा वह मात्र एक आदत बनकर रह जाएगी. इस आध्यात्मिकता का प्रमाण जितना अधिक होगा उतना ही व्यक्तिजीवन, समाजजीवन, राष्ट्रजीवन और विश्वजीवन शांति से और सुचारू रूप से चलेगा. इसका अभाव कुंठा और अशांति को जन्म देगा.

लेकिन एक प्रश्न फिर भी सामने खडा होता है. वह है- स्वयं की आध्यात्मिकता और लौकिक आवश्यकताएं इनका मेल किस प्रकार बिठाना? स्वयं की आध्यात्मिकता और दूसरों की आध्यात्मिकता इनका मेल कैसे बिठाना? स्वयं की आध्यात्मिकता और दूसरों की लौकिक आवश्यकताएं इनका मेल किस प्रकार बिठाना? स्वयं की लौकिक आवश्यकताएं और दूसरों की आध्यात्मिकता इनका मेल किस प्रकार बिठाना? इसके लियें कोई सार्थक उत्तर हो नहीं सकता. उसके लिए केवल एक मार्गदर्शक सूत्र हो सकता है. वह सूत्र है- क्या हम व्यापकता की ऑर बढ रहे है? हमें व्यक्तिगत रूप से, सामूहिक रूप से, राष्ट्रीय रूप से, वैश्विक रूप से व्यापकता की ऑर ले जाने वाली बातें, कृतियाँ योग्य है ऐसा समझना चाहिए. हमारे कर्मों से औरों को कोई नुकसान ना हो या तकलीफ ना हो यह सतत देखने की बात है. हर किसी को इसके लिए चौकन्ना रहना चाहिए. किन्तु संपूर्ण विश्व इस प्रकार सोचेगा या इस दिशा में प्रयास करेगा यह तो संभव नहीं है. इसीलिए कई व्यवस्थाओं का निर्माण होता है. लेकिन यह व्यवस्थाएं व्यापकता की ऑर बढने में सहायता करनेवाली होनी चाहिए. इसीलिए लचिली भी होनी चाहिए. यही धर्म है.

धर्म किसी व्यवस्था का नाम नहीं है. न ही वह कोई निश्चित नियम और रचना है. धर्म तो एक जीवमान प्रक्रिया का नाम है. स्वयं के और औरों के अंतर को सोचते सोचते और समझते समझते इस संपूर्ण अस्तित्व के अंतर को सोचने और समझने की प्रक्रिया का नाम है धर्म. इस संपूर्ण अस्तित्व के साथ एक हो जाना यह उस प्रक्रिया का चरम बिंदु है. तब तक यह प्रक्रिया चलती रहती है, रहनी चाहिए. स्वयं की और दूसरों की आध्यात्मिकता और लौकिकता इनका मेल बिठाते बिठाते व्यापकता की ऑर बढने की जो निरंतर चलनेवाली प्रक्रिया है उसीका नाम है धर्म. यह धर्म व्यक्तिजीवन, समाजजीवन, राष्ट्रजीवन, विश्वजीवन का आधार है. उसे ठीक से समझकर चरितार्थ करना यही विश्वशांति की और सहअस्तित्व की अनिवार्य आवश्यकता है.

- श्रीपाद कोठे
- ५६ बैंक कॉलोनी
- भगवाननगर, नागपुर- २७.

शनिवार, ७ जुलै, २०१८

बंगदेशी ६


तो दिवस शांतीनिकेतनचा होता. त्या दिवसाची सुरुवात आदल्या रात्रीच झाली होती. शांतीनिकेतनसाठी बोलपुरला जावे लागते. रेल्वे स्थानक बोलपूरचे. तेथून २-३ किमीवर शांतीनिकेतन. बोलपूरसाठी गाडी सकाळी सहा वाजता सियालदावरून. सकाळची वेळ असल्याने वेळ कमी लागणार तरीही बेफिकीर राहून चालणार नाही. त्यामुळे जाण्याचा अर्धा तास. Taxi वेळेवर मिळते न मिळते त्यासाठी अर्धा तास. म्हणजे पाच वाजता तरी निवास सोडावा लागणार. त्याआधी तासभर आवरायला, तयारीला. म्हणजे चार वाजता उठणे भाग. सकाळी उठण्यासाठी स्वत:वर अमाप विश्वास असल्याने अर्धा तास आधी म्हणजे साडेतीन वाजताचा गजर लावला. शिवाय चौकीदाराला आवाज द्यायला सांगून ठेवले. त्याआधी निवासापुढे taxi नाही मिळाली तर कुठे मिळेल त्याची विचारणा करून तेथवर पायी जाऊन आलो. किती वेळ लागेल इत्यादी गणिते मनाशी करून ठेवली. स्वत:ला स्वत:ची साथ चांगली मिळाली. साडेतीनला गजर वाजल्यावर पावणेचारला उठलो. तयारी करून रस्त्यावर आलो. हमखास taxi मिळेल या आश्वासनाचा काहीही उपयोग नाही हे लक्षात यायला फार वेळ लागला नाही. मग आदल्या रात्री पाहून आलेल्या सार्वजनिक इस्पितळाच्या दिशेने पावले उचलली. तिथे पोहोचण्यापूर्वीच एक गडी आपल्या गाडीला अभ्यंगस्नान घालीत असलेला दिसला. त्याला भीतभीतच विचारले. हो, आंघोळीला किती वेळ लागतो अन किती नाही. पण तो तयार झाला. म्हणाला घड्याळ लावा- दहा मिनिटात निघू. गड्याने शब्द पाळला. सियालदाला वेळेत पोहोचून बोलपूरचा प्रवास सुरु झाला. झुंजूमुंजू होण्याच्या वेळेचा सियालदा-बोलपूर प्रवास... बस, एकदा करावा... एवढेच. दोन तासाच्या प्रवासात अखंड सोबत असते कमलपुकुरांची. खिडकीबाहेरची नजर आत वळवण्याची इच्छाही होत नाही अन आठवणही. छोटेमोठे तलाव. त्यात फुललेली वा फुलणारी कमलपुष्पे. त्यांचे फुलणे उत्सुकतेने पाहणाऱ्या कमलकलिका. त्यांच्यावर मायापाखर करणाऱ्या कोवळ्या सुवर्णरश्मी. चुकार पाखरे, त्यांचे बागडणे, त्यांचे गाणे, बोलणे; सगळे आपल्याला सोबत घेऊन जाणारे.
बोलपूर छोटेसे स्थानक. रवींद्रनाथांच्या विश्वभारतीमुळे लोकांची येजा असते त्यामुळे दखलपात्र. अन्यथा कोणत्याही मुक्या स्थानकात गणना व्हावी असे. स्थानकाबाहेर आले की, सरळ `टोटो’त बसायचे. टोटो म्हणजे ई-रिक्षा. हे रिक्षा तुम्हाला सरळ विश्वभारतीला घेऊन जातात. हवं असेल तर संपूर्ण विश्वभारती फिरवून आणतात आणि परत बोलपूरला सोडूनही देतात. तुमचा कार्यक्रम असेल तसे. अशाच एका टोटोने शांतीनिकेतनात दाखल झालो. इ.स. १८६१ मध्ये देवेंद्रनाथ ठाकूर यांनी ही जागा घेतली. त्यावेळी तेथे असलेल्या एकमेव इमारतीत निरीश्वर ब्रम्हाची उपासना सुरु केली. त्यासाठी लोकांना हाकारले. लोकही आलेत. आश्रम सुरु झाला. आज त्या इमारतीला काचेचे असल्याने काच मंदिर, उपासना मंदिर, ब्रम्हमंदिर म्हटले जाते. या ठिकाणी देवेन्द्रनाथांना शांती लाभल्याने त्यांनी नामकरण केले शांतीनिकेतन. हळूहळू लोक येऊ लागले. भोवती गाव वसले. त्या गावाचे नाव पडले शांतीनिकेतन. त्या दिवशी विश्वभारतीत विशेष कार्यक्रम होता. काच मंदिरातील प्रार्थना आटोपली होती आणि आम्रकुंजात `माधोबी वितान’च्या पार्श्वभूमीवर रवींद्र संगीताचा कार्यक्रम सुरु होत होता. टोटोतून उतरून कार्यक्रमात जाऊन बसलो. ब्रम्ह कसं आहे यावर उपनिषदे म्हणतात- आनंदम ब्रम्हेती. त्यामुळे ब्रम्होपासक ठाकूरांच्या या विश्वभारतीत सगळा आनंदाचा बाजार. कोण, कुठला, कुठे चालला काही नाही. संगीताचं नवीन दालन विकसित करून समृद्ध करणाऱ्या रवींद्रनाथांच्या नावानेच पुढे ओळखल्या जाऊ लागलेल्या रवींद्र संगीताचा श्रुतीमधुर कार्यक्रम दोनेक तास चालला. आजी माजी विद्यार्थी, शिक्षक, अभ्यासक, पाहुणे, आगंतुक असे सारे मिळेल तेथे बसून संगीतात रमले होते. विश्वभारतीच्या वैशिष्ट्याप्रमाणे झाडांच्या सावलीतच कार्यक्रम सुरु होता. कार्यक्रम आटोपला. परिसर न्याहाळत थोडा वेळ घालवला. सगळे हळूहळू आपापल्या मार्गाने जात होते. मैदानात पलीकडे संध्याकाळच्या नाटकासाठी मंच उभारणे सुरु होते. एका झाडाखाली चार-पाच जण बोलत उभे होते. त्यांच्याजवळ गेलो. परिचय दिला आणि विश्वभारती पाहायला आल्याचे सांगितले. त्यातील एक होते सलील सरकार. विश्वभारती हेच ज्यांचे विश्व आहे असे एक शिक्षक. अन त्यांच्याशी बोलत होता केरळचा अरिजित राय. अरिजितने येथील institute of rural reconstruction मध्ये शिक्षण घेतले आहे. मी विश्वभारती पाहायला आलो याचा त्यालाच माझ्याहून जास्त आनंद झाला. तो स्वत:च म्हणाला- चला, मी दाखवतो. सलील सरकार यांचा निरोप घेऊन निघालो. अरिजित समरसून दाखवत होता, सांगत होता. हे ब्रम्ह मंदिर, हा आम्रकुंज, ही माधवीलता, हे पाठभवन, हे संगीत भवन, हे कला भवन, हे घंटाघर, हे छातीमताला, या मुलींच्या वसतिगृहात इंदिरा गांधी राहत असत... दमट हवामानामुळे येणारा घाम पुसत अरिजित सांगत होता. जाताजाता वाटेत बकुळ लागली. एकीकडे त्याचे बोलणे ऐकत बकुळीची ओंजळभर फुले वेचून घेतली. तेवढ्यात तिथून जाणाऱ्या एका व्यक्तीकडे बोट दाखवून अरिजित सांगू लागला- `हा माणूस रोज इथे येतो. ३६५ दिवस. काहीही काम नसतं. फक्त येतो. बसतो मनास येईल तेवढा वेळ अन निघून जातो. तो इथे वर्तमानपत्र टाकत असे. वेडा झाला. पण विश्वभारती मनात तसंच राहिलं.’ हे ऐकताना मानवी वेडेपण डोक्यात नाचू लागलं. अरिजितला म्हटलं- `रवींद्रनाथ नावाच्या वेड्याला भेटायला हा दुसरा वेडा येतो.’ तोही हसला.
अरिजितसोबत कलाभवनला पोहोचलो. तिथे त्याने एका मराठी मुलाची ओळख करून दिली. पण त्यांची परीक्षा सुरु असल्याने त्याच्याशी बोलताबसता आले नाही. अरिजितलाही काम होते. मी काही त्याची वेळ घेऊन गेलो नव्हतो. तो निरोप घेऊन गेला. सूचना देऊन गेला. समजावून गेला. तो गेल्यावर कलाभवनच्या परिसरात एका झाडाखाली बसलो. शेजारीच रामकिंकर दा या प्रसिद्ध शिल्पकाराने घडवलेला गांधीजींचा पुतळा आहे. प्रतिकात्मक अशा पद्धतीने गांधीजींच्या पायाखाली एक मानवी सांगाडा शिल्पित केला आहे. त्या पुतळ्यावरून बराच वाद झाला होता अन त्यावर बंदीही घालण्यात आली होती. पण तो सारा इतिहास आहे. परिसरात विद्यार्थी येत जात होते. थोडा वेळ परिसराचा आस्वाद घेऊन शेजारच्या खानपानगृहात गेलो. तिथे चविष्ट पुरीभाजीचा आणि फक्कड चहाचा आनंद घेऊन बाहेर पडलो. आवाराबाहेर येऊन रस्त्याने जाणारी टोटो पकडली. त्याने विश्व भारतीचा सगळा परिसर दाखवला. सोबत त्याची running commentary पण होतीच. अर्थात त्याशिवाय फिरण्याला अर्थही राहिला नसता. रवींद्रनाथांचे घर, संग्रहालय, विद्यापीठाच्या विविध वास्तू, जुनी झाडे, इमारती तो दाखवत आणि सांगत होता. अमर्त्य सेन जिथे राहत त्या बंगल्यासमोर अनेक मे-फ्लॉवर दाटीवाटीने फुलले होते. बंगाली संस्कृतीची ओळख करून देणारे एक शिल्पग्राम देखील विद्यापीठ परिसरात आहे. तिथे राणी मां गैदिन्ल्यू, बिरसा मुंडा, तिलक मांझी यांच्यासह अन्य काही वनवासी योद्ध्यांचे पूर्णाकृती पुतळे आहेत. तसेही विश्वभारतीच्या मूळ प्रकृतीशी हे साजेसेच आहे. विश्वभारतीला सुरुवात झाली तेव्हा तेथे वार्षिक हिंदू मेळा आयोजित करण्यात येत असे. त्याद्वारे देशभक्तीची ज्योत प्रज्वलित करण्याचा प्रयत्न होत असे. पुढे ते मागे पडले. त्याच्या स्मृतीही मागे पडल्या. परंतु हे पुतळे मात्र त्या भावनेशी सुसंगतच ठरतात. या शिल्पग्रामात ओरिसातील ग्रामीण घर, मंदिर यांचीही रचना पाहायला मिळते. ओरिसा आणि बंगाल तसे एकमेकांशी पुष्कळ जोडलेले आहेतच. हस्तकलेचा एक इवलासा हाटही तिथे भरला होता. बाऊलसाठी वापरले जाणारे एकतारी वाद्य हे एक आकर्षण अन लोभ होता, पण प्रवासात ते आणणे शक्य नसल्याने मनाला आवरले. त्या वाद्यालाच बाऊल म्हणतात अशी माहिती एकाने दिली. अर्थात माझ्या माहितीप्रमाणे बाऊल हा एक भक्तीपंथ आहे. अर्थात तो विषय विद्वानांचा अन अभ्यासकांचा आहे. आपण आपले ऐकून हो म्हणावे. कसे? हाटाशेजारच्या मैदानावर एका कार्यक्रमाची तयारी सुरु होती. अन तेथे लडिवाळ असे `आमी चीनी गो चीनी’ वाजत होते.
टोटोने विश्व भारतीजवळील हरिणांसाठी राखीव असलेले जंगल, चामडी वस्तू तयार करणारा, ग्रामीण महिला पुरुषांना रोजगार मिळवून देणारा कारखाना, चामडी वस्तू, बटिक प्रिंटचे कापड विक्रीचे दुकान असे सगळे दाखवले. या दुकानाच्या शेजारीही एका झाडाखाली एक कलाकार बाऊल गीते गात बसला होता. त्याच्या गाण्याच्या तालावर सात बदकांची एक रांग त्याच्या डावीकडून आली आणि डौलात चालत चालत, परिसरातील सगळ्यांचे लक्ष वेधून घेत आणि पाहणाऱ्या साऱ्यांकडे दुर्लक्ष करत; उजव्या बाजूच्या अमलताश, चाफा, बकुळ, जास्वंद यांच्या बनात निघून गेली. तेथे थोडा वेळ घालवल्यावर परतताना टोटोने विश्वभारतीला जोडून उभारण्यात आलेले श्री निकेतन दाखवले. ग्रामीण पुनरुत्थान आणि महिला सबलीकरण ही श्री निकेतनची उद्दिष्टे. उन उतरणीला लागलं होतं. विश्वभारती पाहून झालं होतं. रवीन्द्रनाथ आठवून, साठवणं सुरु होतं. रवींद्रस्मृतींचा, श्यामोलीचा, आम्रकुंजाचा, अन तेथील लाल मातीचा गंध भरून घेत निरोप घेतला. अरिजितला फोन करून बोलावून घेतले. त्याचे हात हाती घेऊन त्याचाही निरोप घेतला. त्याच टोटोने बोलपूर स्थानकावर परतलो. गाडीला अवकाश होता आणि त्यातच भर म्हणजे एक तास विलंबाने येणार होती. करायला काहीच नव्हते. पण करायला काहीच नसणे ही समस्या नसलेल्या लोकांपैकी मी असल्याने, चहाचा पेला घेतला आणि एका सिमेंटच्या बाकड्यावर जाऊन बसलो निवांत. अशा वेळी जे जे आपल्या वाट्याला येतं, तो बोनस असतो. माणसांचा, अनुभवांचा, निसर्गाचा, आनंदाचा, दु:खाचा; कशाचाही. दोन घोट घेतले आणि पायाशी एक कुत्रा येऊन बसला. पुढला तासभर तो तसाच पायाशी बसला होता. त्याचा उद्योग एकच- बाकड्याच्या पाच फूट अंतरावरून जाणाऱ्या लोकांवर ओरडणे. बाकी काहीच नाही. कोणी जवळ आलं की ओरडायचं, पुन्हा गुपचूप बसून राहायचं. कधी कधी झोपल्याचं सोंग घेऊन. कारण झोपून असला तरीही माणूस जवळ आलं की हा पठ्ठा ताडकन उठणार. तासभर हा प्रकार सुरु होता. मी तिथून गाडीसाठी जाईपर्यंत. जणू माझा राखणदार म्हणूनच त्याची नियुक्ती होती. काहीच नसताना अशा गोष्टीही मौज वाटतात. परंतु आणखीन एक छान बोनस माझ्या पदरी पडणार होता, ज्याची मला कल्पना नव्हती.
चहा पिऊन झाला. पैसे देऊन झाले. इकडे तिकडे पाहत असतानाच पल्याडच्या फलाटाला लागून असलेल्या भल्या मोठ्या चिंचेच्या झाडाने लक्ष वेधून घेतले. शेकडो कावळ्यांचे त्या झाडावर संमेलनच भरले होते जणू. सगळे एका सुरात कावकाव करत. थोडा वेळ कावकाव झाली की सगळे एकसाथ आकाशात भरारी घेत. थोड्या घिरट्या घालत. मग इकडे तिकडे; कुणी फलाटावर, कुणी बाकड्यांवर, कुणी गाड्यांवर, कुणी जिन्यावर, कुणी कुठे, कुठे; जाऊन बसत. हळूहळू पुन्हा चिंचेच्या झाडाकडे परतत. सगळे गोळा झाल्याचे कसे कळत असेल ठाऊक नाही. पण सगळे जमले की पुन्हा एकाच सुरात कावकाव. ही कावकाव सुरु होई त्यावेळी एकही कावळा अन्यत्र दिसत नसे. कावकाव संपली की उड्डाण. पुन्हा सगळे चक्र. अगदी तल्लीन होऊन त्यांचा हा संध्याखेळ सुरु होता. मीही तल्लीन होऊन निसर्गाचा तो सुंदर विभ्रम पाहत होतो. मनात आले- रवींद्रनाथांनी असे कावळे पाहिले असतील का? त्यांनी कावळ्यांवर लिहिले आहे का मला ठाऊक नाही. पण लिहिण्याचा मुद्दा आला तेव्हा सहजच माउली आठवून गेलीच. अर्थात माउलीचा कावळा एकच होता. इथे अनेक कावळे कोकत होते. अन मीही त्यातील प्रत्येक काऊ कोणता शकून सांगतोय हे शोधत होतो. बोलपूर स्थानक मनात घट्ट बसलं आणि परतीच्या गाडीत बसलो.
कोलकात्याला पोहोचलो. प्रीपेड taxi केली. गाडीत जाऊन बसलो. गाडी बाहेर काढता काढता चालक म्हणाला- अमुक रस्त्याने वाहतूक खोळंबली आहे, आपण अमुक रस्त्याने जाऊ. अमुक एवढ्यासाठी की मी कोलकतेकर नसल्याने रस्ते लक्षात नाहीत. म्हटले- बरे. तर म्हणाला- तीस रुपये जास्त द्याल. मध्ये टोल पण आहे. मी काही बोललो नाही. गाडी चालू लागली. मधे टोल नाका आला. त्याने हात मागे केला. म्हणाला- १० रुपये. मी २० ची नोट दिली. त्याने पैसे दिले. पावती अन दहा रुपये परत घेतले अन समोर ठेवले. मुक्कामी पोहोचलो. त्याने हात पुढे केला. तो तीस रुपये म्हणाला होता. २० मी दिले होते. म्हणून १० ची नोट पाहिली. ती नव्हतीच. गाडी चालकच बोलला- जाऊ द्या २० देऊन टाका. म्हणजे वाहतूक खोळंबा हे कारण यासाठी होते. माझ्या स्वभावाप्रमाणे एखादा शब्द तरी बोलायला हवा होता पण विश्वभारतीच्या तंद्रीतून बाहेर पडायला मन तयार नव्हतं. त्यामुळे सोडून दिलं. उतरताना मनाने एक नोंद मात्र केली. ही taxi नवीन आलेल्या पांढऱ्या निळ्या taxi पैकी होती. काळ्यापिवळ्या जुन्या taxi पैकी नव्हती. आधीचे जुन्या गाडीवाल्यांचे दोन अनुभव आणि हा नवीन गाडीवाल्याचा अनुभव; मानसिकतेचा बदल सांगून गेले.
विश्वभारतीचा दिवस संपला होता. आज अशी विद्यापीठे, त्यांचे परिसर, निसर्गाच्या साथीने शिक्षणाचे प्रयोग, गुरुकुल पद्धतीचे प्रयोग अन्यत्रही सुरु झाले आहेत. त्यामुळे त्या अर्थाने कदाचित तिथे खूप काही मिळेल असे नाही. पण आजपासून शंभर वर्षांच्या आधी असा प्रयोग करण्याचे ऐतिहासिक महत्व, धाडस, जमीनदार असून शिक्षण- कला- साहित्य- देशभक्ती- यांचा घेतलेला ध्यास; अन हा ध्यास घेणारे मोठ्या उंचीची प्रतिभा लाभलेले रवींद्रनाथ तेथे ३०-३२ वर्षे वावरलेत, तिथल्या मातीशी- निसर्गाशी एकरूप झालेत; त्या निसर्गात त्यांचे श्वास मिसळून गेलेत, अन तेथील लाल मातीत त्यांची पदचिन्हे रुतली- रुजली हा भाव; हे मात्र फक्त शांतीनिकेतनातील विश्वभारतीतच लाभू शकते. सकाळी वेचलेली बकुळफुले खिशातून काढून टेबलवर ठेवली. त्यांचा सुगंध पसरला आणि दिवा मालवून निद्रेला पालवू लागलो.
- श्रीपाद कोठे
नागपूर
शनिवार, ७ जुलै २०१८

मंगळवार, २६ जून, २०१८

बंगदेशी ५


उत्तर कोलकात्याच्या जोडासांको भागातील ठाकूरबारी हे एक बंगाली तीर्थस्थान आहे. `कविगुरू’ म्हणून ख्यात असलेल्या रवींद्रनाथ टागोर यांचे हे घर. घर कसले खूप मोठ्ठी हवेलीच. किती मोठी? फक्त ३५ हजार वर्ग मीटर एवढ्या आवारात !! आज तेथे `रवींद्र भारती विद्यापीठ’ आहे. १९६२ साली तत्कालीन पंतप्रधान पंडित जवाहरलाल नेहरू यांनी या विद्यापीठाचे उद्घाटन केले होते. रवींद्रनाथांचे आजोबा द्वारकानाथ ठाकूर यांनी १७८५ साली ही हवेली बांधली. रवींद्रनाथांनी पहिला आणि शेवटचा श्वास घेतला तो याच हवेलीत. त्यांचा विवाह देखील येथेच झाला. पण ८०-८१ वर्षांच्या आयुष्यातील सुरुवातीची १७ वर्षे आणि अखेरची नऊ वर्षे, अशी २६ वर्षेच ते या हवेलीत राहिले. त्यांच्या काव्यलेखनाची सुरुवात याच ठिकाणी झाली. साहित्य, संगीत, चित्रकला, नाटक अशा विविध कला प्रकारांवर आपला ठसा उमटवणारे आणि त्यात मोठे योगदान देणारे रवींद्रनाथ टागोर यांनीच नोबेल पुरस्कारांच्या नामावळीत भारताचे नाव प्रथम नोंदवले. टागोरांनी कला साहित्यात फक्त योगदान दिले असे नाही तर बंगाली मानसाला वळण देण्याचा मोठा प्रयत्न केला. मुख्य म्हणजे युगांतराच्या काळातील त्यांच्या साहित्याने आणि कलेने मूळ भारतीयत्वाचा धागा टाकून दिला नाही, सुटू दिला नाही. भारतीयत्वाचा प्रवाहच नवीन रुपडे घेऊन त्यांच्या साहित्यातून, कलेतून वाहत राहिला. रवींद्रनाथांच्या वयाच्या ४० व्या वळणावर पत्नी मृणालिनी देवी यांनी या जगाचा निरोप घेतला. त्यानंतरची ४० वर्षे ते `एकला चालो’ असेच जगले. त्याशिवाय प्रचंड प्रतिभावान, प्रज्ञावान लोकांना जे वेगळ्या प्रकारचे एकाकीपण जाणवते, त्यांच्या विचार आणि भावनांना सशक्त प्रतिसाद न मिळण्याची जी कमतरता त्यांना आयुष्यभर त्रास देते; ते एकाकीपण तर होतेच. त्यानेही त्यांची आध्यात्मिक वृत्ती आणखीन पुष्ट केली. वाडवडिलांकडून त्यांना सांपत्तिक वारसा लाभला पण त्यात ते बुडाले नाहीत. संपत्ती त्यांची होती पण ते संपत्तीचे झाले नाहीत. ती आणखीन वाढवण्याच्या फंदात ते पडले नाहीत. त्याऐवजी जीवनातल्या सत्य-शिव-सुंदराची आराधना करण्यात ते रत राहिलेत. असे रवींद्रनाथ जन्मले, राहिले आणि परत गेलेत ती ही ठाकूरबारी.
गिरीश पार्क मेट्रो स्थानकावर उतरून थोडा वेळ चालत गेलो की आपण या हवेलीत पोहोचतो. दोन मार्गांनी येथे पोहोचता येते. एक रवींद्र भारती विद्यापीठाच्या बाजूने आणि दुसरे पैतृक घराच्या बाजूने रवींद्र सारिणीवरून. कोणत्याही प्रवेशद्वाराने गेलो तरीही दारातला चाफा आपले हसून सुगंधी स्वागत करतो. ठाकूरबारीचे दोन स्पष्ट भाग आहेत. एक `रवींद्र भारती विद्यापीठ’ आणि दुसरे टागोरांचे पैतृक घर. हवेलीसमोरील मोठ्ठ्या मैदानातील बाग पार करून घरात प्रवेश करताना उजव्या हाताला रवींद्रनाथांचा सुरेख अर्धपुतळा आहे. हवेलीतील संग्रहालयात तीन दालने आहेत. त्यात रवींद्रनाथ, कुटुंबीय आणि बंगाली नवोत्थान प्रयत्नांचे चित्रमय दर्शन होते. वेगवेगळी लहानमोठी चित्रे, काही वस्तू पाहणाऱ्याला जुन्या काळात घेऊन जातात. गाण्यांच्या जुन्या तबकड्या, त्यांना विविध ठिकाणी मिळालेल्या भेटवस्तू, त्यांच्या मोजक्या चित्रफिती, त्यांनी काढलेली चित्रे; हेही या दालनांमधून पाहायला मिळते. रवीन्द्रनाथांनी अखेरचा श्वास ज्या खोलीत घेतला ती खोलीही जतन केली आहे. त्यांनी विश्वात्मकाला गीतांची अंजुली `गीतांजली’ वाहिली होती. मी त्यांना काय वाहणार? मी त्यांना मौन भावांजली वाहून तेथून बाहेर पडलो.
बंगाली मनाला वेड लावणाऱ्या आणि जगालाही भुरळ घालणाऱ्या या तत्वज्ञ कवीच्या या निवासाला भेट देणे हा एक आनंदाचा आणि समाधानाचा विषय. परंतु तिथे होणाऱ्या उत्सवांच्या वेळी तिथे जाऊ नये असे माझे व्यक्तिगत मत. हां, उत्सवांचा अनुभव हा स्वतंत्र विषय, पण कवीगुरूंशी, त्यांच्या व्यक्तित्वाशी, त्यांच्या भावविश्वाशी, त्यांच्या चिंतनाशी, त्यांच्या अनुभवांशी एकरूप व्हायचे असेल, ते सारे feel करायचे असेल तर जो निवांतपणा हवा तो उत्सवांच्या वेळी मिळत नाही. मी गेलो तो रवींद्रनाथांचा जन्मोत्सव होता. खरं तर त्या दिवशी जाऊन त्या विश्वात रमावे हाच हेतू. पण त्या दिवशी ठाकूरबारीत अक्षरश: जत्रा असते. एरवी सकाळी १० ते दुपारी साडेचार उघडे असणारे हे घर त्या दिवशी सकाळी ६ ते रात्री ११ वाजेपर्यंत उघडे असते. अन रवींद्रनाथांवर अपार माया करणारे सर्व वयोगटातील, सर्व आर्थिक- सामाजिक स्तरातील लाखो बंगाली स्त्री-पुरुष यांची तिथे रीघ लागलेली असते. अंगणात टाकलेल्या भव्य मंडपात सतत कविता, नृत्य, नाट्य असे काही ना काही सुरूच असते. प्रत्येक कलाकार आपापल्या कलेद्वारे आपल्या ;लाडक्या `रोबी’ला भावांजली वाहत असतो. बंगाली माणसाचे हे रवींद्रप्रेम अनुभवल्याविना कळणे नाही. ते मी अनुभवले पण `रोबी’शी जे तदाकार व्हायचे होते ते मात्र होता आले नाही.
तिथे घालवलेल्या काही तासात; रवींद्रनाथांची आजी दिगंबरी देवी, काकू जोगमाया देवी, मोठी वहिनी ज्ञाननंदिनी, दुसरी वहिनी कादंबरी देवी आणि पत्नी मृणालिनी देवी; या स्त्रियाही मनात पिंगा घालत होत्या. रवींद्रनाथांच्या जडणघडणीत या महिलांचाही मोठा वाटा होता. किंबहुना अन्य कोणापेक्षा अधिक वाटा होता. रवींद्रनाथांना अचानक आणि ध्यानीमनी नसताना लग्न करावे लागले होते, पत्नी अवघ्या १४ व्या वर्षी आई झाली होती, वहिनी कादंबरी देवी यांनी वयाच्या ऐन विशीत आत्महत्या केली होती, अन वहिनी ज्ञाननंदिनी एकटीने इंग्लंड वगैरे फिरणारी. अशा या विविध छटांच्या, वृत्तींच्या स्त्रियांनी त्यांच्या भावभावनांना आकार दिला होता. कादंबरी देवी या तर त्यांच्या कवितेच्या प्रथम वाचक आणि समीक्षक होत्या. त्यांच्या कथा कादंबरीतून भेटणारी स्त्री पात्रे याच महिलांनी प्रभावित केलेली असावीत असाही एक विचार मनात येऊन गेला. शब्दसुरांचा, रंगरेखांचा, निराकार ब्रम्हाचा हा उपासक; बंगभूमीचा अन भरतभूमीचा पुत्र, समाजोत्थानाचा ध्यास घेतलेला कर्मवीर; अशा विविध रूपातील रवींद्रनाथांचा पिंड जेथे आकारला त्या ठाकूरबारीचा अनुभव भावश्रीमंत करणारा होता. अर्थात तदाकार होण्यासाठी पुन्हा भेट द्यावी लागणार हे नक्की. हवेलीच्या प्रवेशद्वारातून बाहेर पडताना थोडी चाफ्याची फुले आणि चिमूटभर माती बांधून घेतली आणि निघालो.
- श्रीपाद कोठे
नागपूर
मंगळवार २६ जून २०१८

शुक्रवार, २२ जून, २०१८

बंगदेशी – १


बंगदेशी खुणावणाऱ्या अनेक गोष्टी आहेत. काही दिवसांपूर्वी अशीच साद आली बंगदेशाची अन जाऊन आलो गळाभेट घेण्यासाठी. हावडा स्थानकावर उतरलो आणि prepaid taxi ने मुक्कामी पोहोचलो ते मनात थोडे आश्चर्य घेऊनच. आश्चर्य याचे की, रस्ते इतके मोकळे का? कोलकात्याला काही मी पहिल्यांदाच गेलो नव्हतो. परंतु रस्त्यांवर इतका शुकशुकाट प्रथमच जाणवला. याच कोलकाता नगरात, एकाच जागी तासभर अडकून पडण्याचा अनुभवही घेतला होता. मग लक्षात आले, अरे आज तर रविवार. म्हणूनच taxi १५-२० मिनिटात मुक्कामी पोहोचली. मुक्कामाजवळ पोहोचलो तर खरं, पण वळणावर गाडी थांबवून चालक म्हणाला- गाडी आत जाणार नाही. माझ्या प्रश्नार्थक चेहऱ्याकडे पाहून म्हणाला- no right turn. आता आली पंचाईत. मग विश्वास देत म्हणाला- थोडंच चालत जावं लागेल. म्हटलं- ते ठीकाय बाबा. पण तू नेमकं पोहोचवलं आहेस की नाही खात्री तर करून घेऊ दे. आता आणखीन पंचाईत. सामान घेऊन पत्ता शोधणे त्रासाचे. अन सामान गाडीत ठेवून जायचे तर मनाची चलबिचल. बरे गाडीचे पैसे द्यायचे आहेत असेही नव्हते. ते आधीच देऊन झाले होते. शेवटी त्याला म्हटले- सामान राहू दे गाडीतच. मी आत पाहून येतो. तो हो म्हणाला. आतल्या रस्त्याला (मोठा दुपदरी रस्ता असूनही आलो त्या बाजूने right turn नव्हता.) थोडं चालत जाऊन मुक्कामाची खात्री करून आलो. गाडी दृष्टीआड होईल एवढे आत जावे लागले होते. परतलो तेव्हा गाडीत बसून चालक गाणी ऐकत होता. त्याला धन्यवाद देऊन सामान घेऊन मुक्कामी आलो. अशा रीतीने बंगदेशीच्या प्रवासाची सुरुवात तर छान झाली. मोकळे रस्ते आणि प्रामाणिक वाहनचालकाने कोलकात्यात स्वागत केले.
आंघोळ वगैरे उरकून बाहेर पडलो. पहिली भेट कुणाची घ्यावी? स्वाभाविक उत्तर आले- चलो दक्षिणेश्वर. मां भगवतीच्या भेटीला. पहिल्यांदा कुणाला भेटणार आईशिवाय? कोलकात्याच्या भुयारी मेट्रोने जाऊ म्हटले. कोलकात्याच्या भुयारी मेट्रोचा माझा हा पहिलाच अनुभव. नंतरच्या मुक्कामात मेट्रोलाच प्राधान्य दिले एवढा हा अनुभव छान होता. `श्याम बझार’ स्थानकाचे टोकन घेतले. टोकन देणारा स्वाभाविक बंगालीत बोलला. मला काहीही कळले नाही. पण मागेच असलेल्या एका तरुणीने माझी अडचण लक्षात घेऊन स्वत:हून दुभाष्याचे काम केले अन प्रश्न सुटला. त्याच वेळी कुठून ट्यूबलाईट पेटला कुणास ठाऊक. मनात म्हटले- परत येताना इथेच यायचे आहे. पण इथे म्हणजे कुठे? या स्थानकाचे नाव काय? अन्य कष्ट घेण्याऐवजी त्या तरुणीलाच विचारले. तिनेही सहज सांगितले. `कोण हा बावळट, कुठून आला’ असे कोणतेही भाव चेहऱ्यावर न दाखवता म्हणाली- `जतीन पार्क.’ मनाला बजावले- पुढील काही दिवस `जतीन पार्क’ हे शब्द मुळीच विसरायचे नाहीत. कोलकाता मेट्रो खरंच व्यवस्थित आहे. फलाटावर उतरले की, डावीकडे आणि उजवीकडे लहान पाट्या लटकलेल्या दिसतात. फलाटावर येणारी गाडी कोणत्या स्थानकांवर पुढे जाणार हे त्यावर लिहिले असते. ते वाचून आपला फलाट निवडता येतो. वेगाने येणारी गाडी पूर्ण थांबल्याशिवाय स्वयंचलित दरवाजे उघडत नाहीत. त्यामुळे धावत धावत चढणे-उतरणे याचा प्रश्नच नाही. शिवाय फलाटावरून डब्यात शिरणे म्हणजे एका खोलीतून दुसऱ्या खोलीत जाण्यासारखे अन दारे तर मोठी असतातच. गाडीने स्थानक सोडले की पुढील स्थानक कोणते आणि त्याचा फलाट कोणत्या दिशेला येणार याची उद्घोषणा होते. हीच उद्घोषणा स्थानक येण्याच्या काही क्षण अगोदर होते. तुम्ही नवीन असलात तरीही त्यामुळे कोणाला विचारण्याची गरज पडत नाही. शिवाय उद्घोषणा अतिशय स्पष्ट आणि बंगाली, हिंदी व इंग्रजी या तिन्ही भाषेत होतात. त्यामुळे अडचण येण्याचा संभव कमीच. मुंबईच्या लोकलपेक्षा मेट्रो केव्हाही उजवी. अपघातांचे प्रमाणही कमी, सुख आणि सुरक्षा दोन्हीची हमी.
दक्षिणेश्वरी पोहोचलो तेव्हा संध्याकाळ झाली होती. विश्वातील सगळ्याच कातर, हळव्या, रम्य, दु:खार्त आनंदाच्या क्षणांचं दान नियतीनेच जिच्या पदरी टाकलं आहे अशी संध्याकाळ. सारं काही स्वीकारण्यासाठी सतत पुढे असलेली कालपुरुषाची ओंजळ म्हणजे संध्याकाळ. अशा संध्याकाळी पुण्यसलीला भागीरथीच्या तीरी भगवतीच्या, आईच्या दारी पोहोचलो होतो. याआधीच्या खेपेस मंदिराबाहेरचा परिसर साधा होता. आता खूप बदलला आहे. मंदिराच्या महाद्वारातून आत प्रवेश करताच लक्षात आलं, इथे मात्र काहीही बदललेलं नाही. चहूभोवताल त्याच सुमारे दीडशे वर्षांपूर्वीच्या मोठाल्या पडव्या. त्यात निवांत बसलेली माणसे. विविध दालनात संस्थांची कार्यालये आदी. राणी रासमणी या कोळी जातीच्या राणीने, स्वप्नातील दृष्टांतानुसार बांधलेल्या या भव्य मंदिराचा इतिहास सांगणारी चित्रे लावलेली, पावनी गंगेच्या वेगवान प्रबल प्रवाहाला समांतर १२ ज्योतिर्लीन्गांची १२ स्वतंत्र पण सारखी मंदिरे. अन विस्तीर्ण प्रांगणाच्या मध्यभागी भगवती मां कालीचं उंच मंदिर. मंदिराच्या डाव्या, उजव्या अन पुढील बाजूने वर जाणाऱ्या पायऱ्यांवर लागलेल्या मोठ्या रांगा. कुठेही गडबड गोंधळ नाही. मंदिरातील शांततेत उलुध्वनी भरून राहिला होता. शांतपणे एका रांगेत जाऊन उभा राहिलो. पाचेक मिनिटात पायऱ्या चढून भगवतीपुढे पोहोचलो. शांत आणि पवित्र तामसिक अशी ही कालिका. कालीरूप असूनही उग्र नसलेली अशी ही दक्षिणेश्वरची मूर्ती आहे. कालीरुपाला इष्ट मानून पाच मकारांची जी तंत्रसाधना करतात ती येथे नाही. `कलकत्ते का काला जादू’ इथे नाही. बळी वगैरे प्रकार नाहीत. काली उपासना असूनही सात्विक जगदंब भाव. मनात असंख्य तरंग उठले. पण क्षणभरच. लगेच मन न-मन झालं. मनोभावे प्रणाम करून बाहेर आलो. मंदिरासमोरच्या एका कट्ट्यावर बसलो. भगवतीसमोर न-मन झालेलं मन आता उन्मन होऊ लागलं. भागीरथीच्या नादमधुर तालात मन कुठे निघून गेलं कळलंच नाही. थोडा वेळ असाच आनंदमय अवस्थेत गेला.
मग आवारात एक चक्कर टाकली. संस्थानने लावलेल्या नळाचे थंडगार पाणी पोट भरून प्यायलो आणि पावले विलक्षण आवेगाने, विलक्षण धुंदीत आणि अपार नम्रतेने ठाकुरांच्या- श्रीरामकृष्ण परमहंस यांच्या खोलीकडे वळली. एक अद्भुत शांती, अद्भुत धुंदी, गंभीर आनंद, अलौकिक पूर्णता या खोलीत सदैव असते. मुख्य म्हणजे यातील काहीही कोणावरही सत्ता गाजवीत नाही. हे सारे फक्त असते... तुम्हाला सोबत करत... हळूहळू तुमचा तू काढून घेत तुम्हाला आपल्यात सामावून घेत. समग्र विश्वाच्या आध्यात्मिकतेला एक दिशा आणि वेग देणाऱ्या ठाकुरांची ही खोली. इथेच त्यांची अद्भुत लीला आकारास आली. इथेच त्यांची लोकविलक्षण साधना मूर्त झाली. इथेच या अस्तित्वाच्या गाभ्याला हात घालणारी, कोटी कोटी मानवांना आधार आणि आनंद देणारी संभाषणे झाली, इथेच स्वामी विवेकानंदांना त्यांनी निर्विकल्प समाधी केवळ स्पर्शाने मिळवून दिली, जात-पात-धर्म-भाषा-लिंग-देश-वेश-वंश- हे सारे भेद कोणताही उच्चार न करता एकाच मूळ आत्मरसात विरवून टाकले. आनंदाचे सप्तसमुद्र याच १० बाय १५ फुटांच्या खोलीत उसळले. पलंगडीवर ठेवलेल्या ठाकूर प्रतिमेला प्रणाम करून खोलीच्या खिडकीजवळ जाऊन बसलो. गंगेच्या विशाल प्रवाहावरून येणारा पश्चिमेचा शीतल वारा जीवाला सुख चारत होता. मन तर निसटून कुठे कुठे भटकत आणि भरकटत होतं. बसल्या बसल्याच तास दीड तास या जगाच्या बाहेर फिरून आलो. ठाकुरांच्या पाठुंगळी बसून.
बाहेर आलो. पुन्हा एकदा पडवीत टेकलो. मग मंदिराच्या आवाराबाहेर पडलो. श्री रामकृष्णांच्या लीलासहधर्मिणी, मां सारदा ज्या नगारखान्यात राहत असत तिथे गेलो. तिथे आता त्यांची बंगाली लाल काठाची साडी परिधान केलेली प्रतिमा आहे. काही बंगाली मंडळी तिथे भजन करीत होती. थोडा वेळ त्यात सामील झालो. इकडे तिकडे भटकलो आणि `श्यामबाजार’ मेट्रो स्थानकावर परतण्यासाठी पाय वळवले. मंदिरात जाण्यापूर्वी बाहेर काढून ठेवलेली पादत्राणे आणि भ्रमणध्वनी परत घेतले आणि निघालो. तेव्हा जाणीव झाली- अरे, गेले तीनेक तास भ्रमणध्वनी आपल्याजवळ नव्हता !! म्हणजे तो कधीच नसला तरी चालू शकेल का? मनात उगाच चुकार प्रश्न येऊन गेला. कर्तव्यावर असलेल्या पोलिसांजवळ जाऊन वाटेची खात्री करून घेतली आणि पावले चालू लागली. मनात भगवती, श्रीरामकृष्ण आणि मां सारदा भरून घेऊन. पुण्यदायीनी भागीरथीचा निरोप घेऊन.
- श्रीपाद कोठे
नागपूर
शुक्रवार, १ जून २०१८

बंगदेशी ४


लाला लजपतराय सारिणी असं अधिकृत नाव असलेल्या, पण एल्गिन रोड याच नावाने प्रसिद्ध असलेल्या रस्त्यावरील `नेताजी भवन’ला भेट देणे हा एक अनुभव आहे. अर्थात असा अनुभव घेण्याची गरज वाटणारे थोडे आहेत हे दिलेल्या भेटीच्या वेळी अनुभवास आले. नेताजी सुभाषचंद्र बोस यांच्या या पैतृक घरी जाण्यासाठी नजीकचे मेट्रो स्थानक आहे त्याचे नावही `नेताजी भवन’ असेच. नव्हे नेताजींच्या घरामुळेच ते नाव मिळाले. अर्थात मेट्रो स्थानकावर उतरल्यावर १०-१२ मिनिटे चालावं लागतं. अतिशय गजबजलेल्या एल्गिन रस्त्यावर `नेताजी भवन’ मात्र शांतपणे अविचल उभे आहे. लाल हिरव्या रंगातील या तीन मजली इमारतीच्या प्रवेशद्वाराजवळ पदपथावर नेताजींचा अर्धपुतळा बसवण्यात आला आहे. प्रवेशद्वारातून आत गेल्यावर उजव्या हाताला एका खोलीत साहित्य विक्री आणि त्यासोबतच घर पाहण्यासाठीच्या तिकीट विक्रीची व्यवस्था आहे. तिकीट घेऊन पुढे जाताच नजरेस पडते ती नेताजींची ऐतिहासिक मोटार. जर्मन बनावटीच्या Wanderer W24 या BLA 7169 क्रमांकाच्या मोटारने नेताजींनी आपल्या निवासाचा अखेरचा निरोप घेतला होता. १९३७ पासून ही मोटार त्यांच्याजवळ होती आणि १९४१ साली भारतातून बाहेर पडण्यासाठी जेव्हा सुभाषबाबू निघाले तेव्हा त्यांचा पुतण्या शिशिर बोस याने याच मोटारीतून त्यांना कोलकात्यावरून तेव्हाच्या बिहारमधल्या आणि आताच्या झारखंडमधल्या गोमोह पर्यंत पोहोचवले होते. तेथून रेल्वेगाडीने सुभाषबाबू पुढे गेले होते. ही गाडी आता आहे तेथे पूर्वी नव्हती. दोन वर्षांपूर्वी तत्कालीन राष्ट्रपती प्रणव मुखर्जी यांच्या हस्ते ती येथे समारंभपूर्वक एका काचेच्या घरात ठेवण्यात आली आहे.
मोटार पाहून चार पावले पुढे गेल्यावर उजव्या हाताला वर जाण्यासाठी जिना आहे. पूर्वीच्या घरांचे छप्पर उंच राहत असे. त्यामुळेच जिने पण उंच राहत असत. नेताजी भवनातील जिनेही असेच उंच. साधारण २०-२२ पायऱ्यांचे. जिना चढून वर गेल्यावर प्रथम आपण पोहोचतो नेताजींच्या शयन कक्षात. १९४६ साली गांधीजींनी या घराला भेट दिली तेव्हा ते या शयनकक्षात आले होते. त्याचे छायाचित्र येथे आहे. या दालनात दारातून आत पाऊल टाकताच डाव्या हाताला मां कालीची तसबीर असून त्याखाली तंत्रोक्त कालिका श्लोक लिहिलेला आहे. नेताजींचे मूळ कुठे होते ते येथे स्पष्ट होते. या साधारण १५ बाय १५ फुटाच्या खोलीत त्यांचे वडील जानकीनाथ यांचा मोठा पलंग, नेताजींचा लहान पलंग, धोतर, छत्री, खडावा, घड्याळ, आरसा, खुर्ची, बूट असे सगळे सामान आहे. १६-१७ जानेवारी १९४१ च्या रात्री याच खोलीतून ते बाहेर पडले होते. ते ज्या मार्गाने गेले तो मार्ग पावलांनी दाखवला आहे. शेजारीच त्यांचे भाऊ सरत बोस यांची खोली आहे. या खोलीत त्यांची आई प्रभावती यांचे छायाचित्र पाहायला मिळते. या खोलीत एक महत्वाची तसबीर पाहायला मिळते. सरत बोस हे THE NATION या वृत्तपत्राचे संपादक होते. २० फेब्रुवारी १९५० रोजी त्यांचे निधन झाले. मृत्यूपूर्वी तासभर आधी म्हणजे रात्री ११ वाजून १० मिनिटांनी त्यांनी आपल्या वृत्तपत्रासाठी अग्रलेख लिहिला होता. त्यात त्यांनी पूर्व पाकिस्तान म्हणजे आजच्या बांगला देशातील स्थितीचा आढावा घेऊन सूचना केली होती की, पूर्व बंगालचे वेगळे राज्य करण्यात यावे. त्यावेळची पूर्व बंगालची एकूण स्थिती आणि भारताचा भाग असलेल्या पश्चिम बंगालमधील विचारप्रवाह, दोन्हीमधील भावनिक बंध हे त्या अग्रलेखातून स्पष्ट होतात. त्यांची सूचना नंतर २१ वर्षांनी, १९७१ साली प्रत्यक्षात आली.
ही दालने पाहून जिन्याने वरच्या मजल्यावर जाताना जिन्याच्या बाजूला एक दालन आहे. ते आहे सुभाषबाबूंचे कार्यालय. याच दालनातून त्यांनी कॉंग्रेसचे अखिल भारतीय अध्यक्ष म्हणून काम केले. आजच्या एखाद्या आमदाराचे कार्यालय सुद्धा त्यांच्या कार्यालयापेक्षा मोठे आणि भपकेदार ठरेल. तो काळ आणि आताचा काळ यातील अंतर हे दालन पाहताना ठळकपणे मनात आल्याशिवाय राहत नाही. त्यावेळी दालन लहान व साधे, पण कर्तृत्व अफाट. अन आज दालने मोठी, भपकेबाज; अन कर्तृत्व खुरटे, खुजे. एक टेबल, चार खुर्च्या, एक सोफासेट, टेबलवर तिरंगा झेंडा, कपाटे... संपले.
जिन्याने वर आल्यावर डाव्या हाताच्या मोठ्या आणि उजव्या हाताच्या लहान दालनात संग्रहालय आहे. डाव्या हाताच्या मोठ्या दालनात प्रवेश केल्यावर पहिलीच तसबीर आहे स्वामी विवेकानंद यांची. त्याखाली लिहिले आहे- AN INSPIRATION. या दालनात अनेक गोष्टी पाहायला मिळतात. नेताजींच्या वस्तू, त्यांनी परिधान केलेला आझाद हिंद सेनेचा गणवेश, त्यांचे हस्ताक्षर, त्यांची कौटुंबिक छायाचित्रे, त्यांची देश विदेशातील छायाचित्रे, कोलकाता महापालिकेचे मुख्य कार्यकारी अधिकारी, कोलकाता महापालिकेचे महापौर, कॉंग्रेसचे नेते, कॉंग्रेसचे अध्यक्ष, विविध देशी विदेशी असामींसह छायाचित्रे इथे पाहायला मिळतात. सतत त्यांच्या भाषणाची ध्वनीचित्रफित सुरु राहते. हिटलर सोबतचे त्यांचे छायाचित्र लक्ष वेधून घेते. क्रूरकर्मा हिटलरला भगवान बुद्धाची मूर्ती भेट देणारे नेताजी आगळेवेगळे ठरतात. शांतिनिकेतनात आंब्याच्या झाडाखाली रवींद्रनाथांसह झोपाळ्यावर बसलेले नेताजी एक वेगळे दर्शन देतात, तर कोलकात्यातील महाजाती सदनाच्या उद्घाटन कार्यक्रमात त्यांच्यासह बसलेले रवींद्रनाथ टोपी घातलेले पाहायला मिळतात. कोलकाता काँग्रेसच्या वेळी घोड्यावर बसलेले आणि एमिलीसोबतचे नेताजीही इथे आहेत. १६ जानेवारी १९४१ रोजी रात्री त्यांनी या घरात अखेरचे जेवण घेतले. ते ज्या मार्बलच्या ताटवाटीत जेवले ती ताटवाटी आणि त्यावेळी त्यांनी परिधान केलेले रेशमी धोतर इथे पाहायला मिळते. नेताजींचे रसिकत्वही या दालनात अनुभवता येते. त्यांचे notebook of favourite songs 1924-1927 या दालनात फिरताना लक्ष वेधून घेतल्याशिवाय राहात नाही. या संग्रहात त्यांनी स्वहस्ताक्षरात रवींद्रनाथांची `आमार शोनार बांगला’ ही कविता लिहिलेली आहे. जपानमधील NIPPON TIMES चे अंक, त्यांनी विदेशी रेडीओवरून केलेली संबोधने इत्यादीही पाहायला मिळते. या दालनातील एक तसबीर मात्र सुभाषबाबूंच्या ज्ञात प्रतिमेपेक्षा एकदम वेगळी आहे. ती आहे, सुभाषबाबू आपल्या वडिलांचे श्राद्ध करतानाची. १९३७ सालच्या या छायाचित्रात कौटुंबिक आणि धार्मिक, पारंपरिक सुभाषचंद्रांचे हृद्य दर्शन होते.
सुभाषबाबूंचे घर पाहून, अनुभवून खाली उतरलो. पुस्तकविक्रीच्या दालनात गेलो. आल्यासारखी दोन पुस्तके घेतली. एक, सुगत बोस यांचं – the nation as mother and other visions of nationhood आणि दुसरं, कृष्णा बोसचं – a true love story : emilie and subhash. विक्रेता बोलका होता. त्याला म्हटलं- पुस्तके महाग वाटतात. तो म्हणाला- हो. महाग आहेत. पण आम्हाला कोणतीही सरकारी मदत नाही. शिवाय समाजाचे हवे तसे आर्थिक पाठबळ नाही. त्यामुळे नाईलाज आहे. त्याने थंड पाणी पाजले. तिथून जायचे होते, `अरविंद भवन’ला. तेथून ते जवळ आहे. त्याला सहज विचारले `अरविंद भवन’ला कसे जाता येईल? त्याने प्रतिप्रश्न केला- ऋषी अरविंद? त्याच्या त्या प्रश्नाने सामान्य बंगाली माणसाच्या मनातही श्री अरविंद यांच्याबद्दल काय भावना आहेत ते स्पष्ट झाले. तेही सुभाषबाबूंच्या संस्थेत काम करणाऱ्या व्यक्तीच्या मनात. सर्वसाधारण समाजात असणारे समज अशा छोट्या छोट्या, क्षुल्लक वाटणाऱ्या घटनातून निर्मूल होतात. मी म्हटले- हो, ऋषी अरविंद. त्याने पत्ता अन रस्ता सांगितला अन म्हणाला- पण तुम्ही ओला किंवा उबेर करूनच जा. ते सोयीचे. १० मिनिटे प्रयत्न केला पण दोन्ही कंपन्यांना भर वाहत्या लाला लजपतराय सारिणीवर उभ्या असलेल्या माझे लोकेशन काही सापडले नाही.
असो म्हणत रस्त्यावरील taxi ला विचारले. तो तयार झाला. आमची स्वारी शेक्सपिअर सारिणीवरील `श्री अरविंद भवन’कडे निघाली. शेक्सपिअर सारिणीला पोहोचल्यावर चालकाने विचारले कुठे थांबायचे? म्हटले- बाबा रे, तुझ्यापेक्षा मी नवखा. इथे विचारावे लागेल. आम्ही विचारत विचारत पुढे जात होतो. शेक्सपिअर सारिणी हा एक लांबलचक रस्ता. खूप पुढे गेल्यावर एकदाचे `श्री अरविंद भवन’ला पोहोचलो. चालक म्हणाला- `आपण फेरा घेऊन आलो. जवळच्या मार्गाने येता आले असते. वेळ आणि पैसे वाचले असते.’ मी म्हणालो- `अरे पण या मार्गावर एकेरी वाहतूक असल्याने त्या पोलीसने हा रस्ता सांगितला ना?’ त्यावर चालक म्हणाला- `ते ठीक आहे. पण पोलिसांना आतील रस्ते कुठे माहीत असतात? तुम्ही पुन्हा याल तेव्हा nightingale hospital जवळ असा पत्ता सांगा. म्हणजे taxi वाला तुम्हाला बरोबर घेऊन येईल.’ अतिशय मैत्रीपूर्ण असा संवाद सुरु असतानाच मी त्याच्या हाती पैसे ठेवले. त्यावर तो म्हणाला- `दहा रुपये कमी परत केले तर चालतील का?’ ठरले होते ८० रुपये, मी दिले होते शंभर रुपये, अन तो मला विचारत होता – दहा रुपये कमी दिले तर चालतील का? पैसे देत असताना माझ्या तर मनात होते, हा कुरकुर करणार. फेरा घेऊन यावं लागलं, चार ठिकाणी विचारावं लागलं याचं भांडवल करणार अन पूर्ण शंभर रुपये खिशात टाकणार. उलट तोच मला विचारत होता, दहा रुपये कमी दिले तर चालेल का? तुम्ही म्हणाल तसं. अशा सौजन्यापुढे कोणीही साहजिकच नांगी टाकेलच ना? म्हटले- ठीकाय बाबा.
श्री अरविंद यांच्या घराचे आवर मोठ्ठे आहे. सगळीकडे झाडे, फुले यांची रेलचेल आहे. मोकळी जागा अधिक आणि बांधकाम कमी आहे. डाव्या, उजव्या बाजूच्या छोट्या इमारती नंतर बांधलेल्या आहेत. साहित्य विक्री, कार्यालय इत्यादीसाठी. आपण मूळ घरात प्रवेश करतो तिथे प्रवेशद्वारावर, देशबंधू चित्तरंजन दास यांनी अरविंद यांच्यावरील अलीपूर बॉम्ब खटल्याच्या वेळी न्यायालयात त्यांच्याविषयी जे उद्गार काढले होते ते लावले आहेत. श्री. चित्तरंजन दास यांनी म्हटले होते –
My appeal to you therefore is that a man like this who is being charged with the offences imputed to him stands not only before the bar in this Court but stands before the bar of the High Court of History and my appeal to you is this: That long after this controversy is hushed in silence, long after this turmoil, this agitation ceases, long after he is dead and gone, he will be looked upon as the poet of patriotism, as the prophet of nationalism and the lover of humanity. Long after he is dead and gone his words will be echoed and re¬-echoed not only in India, but across distant seas and lands. Therefore I say that the man in his position is not only standing before the bar of this Court but before the bar of the High Court of History.
या प्रवेशद्वारातून आत गेल्यावर एक मोठे दालन आणि त्याच्या दोन्ही बाजूंना काही खोल्या आहेत. तेथे आता वाचनालय, पुस्तकालय चालते. मोठ्या दालनातून सरळ चालत गेल्यावर आपण घराच्या मागील भागात पोहोचतो. तेथे आता श्री अरविंद यांच्या समाधीचा एक चौथरा उभारण्यात आला आहे. त्यामागे आणि बाजूला एक लांबलचक पडवी तयार करण्यात आली आहे. पडवीत अरविंदांचा अर्धपुतळा आहे. समाधीवर फुलांची सुरेख आरास असते. दर्शनाला येणारे लोक सुगंधित उदबत्त्या पेटवून बाजूच्या नियोजित जागी ठेवतात. त्यामुळे वातावरण कायम सुगंधित असते. तसे येणारे कमीच असतात. मुख्य प्रवेशद्वाराच्या उजव्या हाताने वर जाण्यासाठी मोठा जुन्या काळचा लाकडी गोलाकार जिना आहे. पहिल्याच पायरीजवळ अरविंदांचे अनुयायित्व स्वीकारून भारतात आलेल्या आणि पांडीचेरीला त्यांच्या कार्यात साथ देणाऱ्या मूळ फ्रेंच श्री मां यांचे जिन्याचे तात्विक वर्णन करणारे उद्धरण वाचायला मिळते. वर जुन्या पद्धतीची दोन मोठी दालने आहेत. काय असेल ते, पण एकूण श्री अरविंद यांचे हे निवासस्थान फारसा ठसा उमटवू शकले नाही. त्यांच्या जीवनात बडोदा आणि पांडिचेरी यांना जे स्थान आहे ते कोलकात्याला नाही हे खरेच आहे. माणसाला न समजणाऱ्याही खूप गोष्टी आहेत असे म्हणत ऋषी अरविंद जेथे जन्मले, बागडले, राहिले, जेथून त्यांनी क्रांतीकार्य केले त्या निवासस्थानाचा निरोप घेतला.
- श्रीपाद कोठे
नागपूर
शनिवार, १६ जून २०१८

बंगदेशी ३


कोलकाता म्हटले की, अनेक नावांची यादी क्षणार्धात नजरेपुढे तरळून जाते. रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, रवींद्रनाथ टागोर, सुभाषचंद्र बोस, योगी अरविंद, डॉ. जगदीशचंद्र बोस, बंकिमचंद्र चटर्जी, बिपिनचंद्र पाल; अशी एक जगाला ललामभूत ठरलेली मांदियाळी. भागिरथीच्या तीरावर बेलूर येथील रामकृष्ण आश्रम, माणिकतला भागातील स्वामी विवेकानंद यांचे जन्मस्थान, एल्गिन रस्त्यावरील सुभाषचंद्र बोस यांचे निवासस्थान, जोडासांकोची ठाकूरबारी, शेक्सपिअर सारिणीवरील श्री अरविंद भवन; हे सगळेच `ये रे’ म्हणून बोलावणारे. अन बोलावू धाडले नाही तरीही हक्काने जावे असे. वाटले तर गुज करावे, न वाटले तर राहिले. नुसतेच जाऊन, डोळाभर पाहून यावे. अनुभवून यावे. साऱ्यांनाच भेटून आलो. माझ्याकडे सांगण्यासारखे काय होते त्यांना? त्यांनी आपल्याला पाहावे यापरता दुजा हेतू नव्हताच. बेलूर तर ३६५ दिवस मनात उगवलेले असतेच. कधीतरी केलेला आठ दिवसांचा मुक्काम जन्मभर पुरेल असाच. जणू त्यासाठीच जन्म. ती भेट पुरणारी असली तरीही, ओढही सरणारी नाही. यावेळी मात्र थोडक्यावर समाधान मानावे लागले. कोलकाता `वाढता वाढता वाढे’ असे असल्याने कधी तरी जाणाऱ्याची अंतर, वेळ चुकणार म्हणजे चुकणार. त्यामुळे पोहोचलो उशिरा. उशिरा म्हणजे सांजारती सुरु होता होता. भास्कर अस्ताचलास टेकण्याच्या वेळी यमनाचे सूर उमटतात- `खंडन भवबंधन जगवंदन वंदी तोमाय... निरंजन नररूपधर निर्गुण गुणमय...’ बेलूर रस्त्यावरील प्रवेशद्वारातच दुरून येणारे स्वर कानी पडतात. झपझप पावले उचलत ठाकूर मंदिरात पोहोचतो. एक एक पायरी चढताना निरंजन यमन कवेत घेतो सारं काही. हे खेव देणंही असं, की सारं काही आहे जिथल्या तिथेच. काहीही लोपत नाही. फक्त जे सारं काही आहे ते निरालंब आहे. कोणत्याही आलंबनाशिवाय. निरालंब सुख, निरालंब दु:ख, निरालंब आनंद, निरालंब वेदना, निरालंब प्रेम, निरालंब संयोग, निरालंब वियोग, निरालंब विश्व, निरालंब ईश, निरालंब शून्यत्व, निरालंब अस्तित्व, निरालंब आसू, निरालंब हसू... जे काही आहे ते शुद्ध आहे, पूर्ण आहे... पूर्णात् पूर्णमिदम... आरती आटोपली. त्या विशाल सभामंडपातील लोक हळूहळू पांगले. सागरात लय पावून उन्मुक्त होण्यासाठी वेगाने निघालेल्या भागिरथीच्या विशाल प्रवाहावरून उजव्या बाजूने आलेली वाऱ्याची झुळूक हळूच कानाशी आली अन म्हणाली- `उठ आता.’ उठलो. पुढे जाऊन त्या निरंजनाच्या अगदी पुढ्यात उभा राहिलो. बोलणे, सांगणे काही नव्हतेच. दोघांनीही एकमेकांना पाहिले. डोळा भरून. माथा टेकवला अन उजवीकडील पायऱ्या उतरलो. मन एकदम भूतकाळात गेले. एकदा कधीतरी सहज उत्सुकता म्हणून येथे आलो होतो. याच पायऱ्यांजवळ उभा होतो. अचानक एक जण जवळ आला. मला न येणाऱ्या बंगालीत काही तरी बोलला. मी फक्त त्याच्या तोंडाकडे पाहिले. मग त्यानेच विचारले होते- `कहां से आए हो?’ तेव्हा उत्तर दिले होते- `नागपूर से.’ त्यावर काहीही न बोलता त्याने आत जाण्यास सांगितले होते. काय होते आत? दुपारच्या भोजनप्रसादाची पंगत. या पलीकडे दिसणाऱ्या भागिरथीच्या प्रवाहात पाय सोडून बसलेली आईच तिथे वाढत होती. तिनेच बोलावून घेतले होते, त्या भर दुपारच्या भुकेल्या वेळी. उत्सुकता म्हणून आलो होतो, तिने काहीही न विचारता पोटाशी धरून प्रेमाने जेऊ घातले होते. अन मग तिचाच होऊन गेलो. नंतरच्या खेपेस, त्या पलीकडच्या आंब्याखाली उभा असताना तिनेच हाती मधुर आंबा घातला होता. असंच काहीबाही घोळवत आवारात फिरू लागलो. अलीकडे सूर्यास्तानंतर नदीकाठावर जाण्यास बंदी केलेली आहे. काही अनुचित घटना घडल्या होत्या त्यामुळे. त्यामुळे नदी काठावरील स्वामी विवेकानंद यांचे समाधी मंदिर, सारदा मांचे मंदिर, अन मिशनचे पहिले अध्यक्ष स्वामी ब्रम्हानंद यांचे मंदिर बंद होते. तेथील गार्ड हे सांगत होता तेवढ्यात एक संन्यासी कोणाशी तरी मराठीत बोलताना कानी पडले. म्हणून त्यांच्याजवळ गेलो. ओळख दिली. थोडावेळ बोललो. मग त्यांना विचारले- मराठी बोलताय तेव्हा कोण कुठले? पण त्यांनी सांगितले नाही. म्हणाले- ते खूप मागे पडलेय. आता आठवतही नाही. पुन्हा ठाकूर मंदिरात आलो. थोडा वेळ निवांत बसलो. परतण्यासाठी पायऱ्या उतरू लागलो. चार पायऱ्या उतरलो असेन आणि आठवलं- आपल्या थंगड्याने ठाकुरांना नमस्कार सांगितला आहे. उतरलेल्या पायऱ्या पुन्हा चढलो. माथा टेकवला. म्हटलं- हा प्रणाम थंगड्याचा. अन बेलूरचा निरोप घेतला.
कोलकाताच्या माणिकतला भागातील स्वामी विवेकानंद यांचे जन्मस्थान, निवासस्थान आता उत्तम रीतीने बांधले आहे. जसे त्यावेळी होते तसेच. सोबतच शेजारची घरे विकत घेऊन थोडा व्याप वाढवला आहे. शिवाय तिथे संग्रहालय आणि विवेकानंद कल्चरल सेंटर सुरु करण्यात आले आहे. बेलूरला उशिरा पोहोचलो होतो. येथे लवकर पोहोचलो. भेट देणाऱ्यांसाठी दुपारी १२ वाजता स्वामीजींचे घर बंद होते. दुपारी दोन वाजता पुन्हा उघडते. पोहोचलो तेव्हा नेमके सव्वाबारा झालेले. आता काय करायचे? तेथील विवेकानंद कल्चरल सेंटरमध्ये गेलो. तिथे भाषा, कला व अन्य काही वर्ग; संशोधन इत्यादी चालते. मी गेलो तेव्हा स्वागत कक्षात एक दोघे बसलेले होते. मीच जाऊन औपचारिक चौकशी केली. शेजारी एका कक्षात रामकृष्ण मिशनचे एक संन्यासी काही काम करत बसले होते. तिथे गेलो. त्यांना म्हटले- नागपूरहून आलो आहे. मी आलो तर स्वामीजींचे घर, संग्रहालय बंद झाले आहे. आपल्या या स्वागत कक्षात बसू का घर उघडेपर्यंत? इथलेच एखादे पुस्तक वाचत बसेन. त्यांनी काहीही आढेवेढे न घेता अनुमती दिली. तिथे ठेवलेल्या पुस्तकातील एक पुस्तक घेतले. स्वामीजींची मातृभक्ती या विषयावरील एका भाषणाची ती पुस्तिका होती. तिथल्या सोफ्यावर मी वाचत बसलो. १०-१५ मिनिटांनी ते संन्यासी भोजनावकाशासाठी बाहेर पडले. त्यांनी पाहिले मी पंखा न लावताच बसलो आहे. त्यांनी स्वागतिकेतील एका व्यक्तीला बोलावले. त्याला सांगितले त्यांना पंखा लावून दे, पाणी दे आणि घर उघडले की सांग. त्याने पंखा लावून दिला. पाणी दिले. अन दोन वाजता सूचनाही दिली. उरलेली दोन पाने संपवून मी घर आणि संग्रहालय पाहायला गेलो. अगदी पहिल्यांदा आलो तेव्हा हे घर एक पडके घर होते. कोणी राहत नव्हते. मेंटेनन्स नव्हता. होता फक्त एक रखवालदार. त्यानेच कुलूप उघडून घर फिरवून आणले होते. त्यानंतर आलो होतो तेव्हा मिशनने नुकताच ताबा घेऊन कामाला अगदी सुरुवात केली होती. याखेपेस घर पूर्ण झालेले होते. एकएक दालन पाहत होतो. तिथे ठेवलेले सामान पाहात होतो. स्वामीजींची चरित्रकथा डोळ्यांपुढून सरकत होती. एकएक प्रसंग आठवत होता. मनात उजळणी होत होती. हां इथून स्वामीजींनी भिकाऱ्याला आपले सगळे कपडे देऊन टाकले होते, या दुसऱ्या मजल्यावरील खिडकीतून उडी मारून खालच्या रस्त्यावर घोडागाडीखाली येणाऱ्या एका बालकाचा जीव त्यांनी वाचवला होता, इथेच त्यांच्या डोक्यावर नाग पाहून त्यांच्या मित्रांनी पळ काढला होता, हेच स्वामीजी फिरवीत ते मुद्गल, याच अशिलांच्या खोलीत त्यांनी वेगवेगळ्या जातीचे वेगवेगळे हुक्के ओढून पाहिले होते काय फरक असतो म्हणून, हा स्वामीजींचा तंबोरा... असे करत करत जीवाचा आनंद सुरु होता. ज्या वीरेश्वर महादेवाच्या भक्तीने नरेंद्र जन्माला आला अशी त्याच्या जन्मदात्रीची श्रद्धा होती, त्या वीरेश्वर महादेवाची पिंड एका दालनात प्रतिष्ठापित करण्यात आली आहे. वीरेश्वराच्या त्या मंदिरात तास दीड तास बसलो. मनात विचार आला- या वीरेश्वराच्या कृपेनेच नरेंद्र खऱ्या अर्थाने वीर झाला होता. सगळ्यांवर अशीच कृपा होवो आणि समस्त मानवप्राणी वीर होवो. या ठिकाणी एक छोटासा प्रार्थना हॉल आहे. आजूबाजूला स्वामीजींचे कुटुंबीय, काका, भाऊ यांच्या खोल्या आहेत. स्वामीजींचे एक भाऊ भूपेंद्रनाथ दत्त हे क्रांतिकारक होते. एवढेच नव्हे तर कम्युनिस्ट विचारधारेचेही त्यांना आकर्षण होते. त्यांनी कम्युनिस्ट कार्यकर्ता म्हणून कामही केले होते. अन रशियाला जाऊन ते लेनिनला भेटूनही आले होते. शेतकरी, शेतमजुरांसाठी तुम्ही काम करा असे लेनिनने त्यांना सांगितले होते. त्यांच्या कक्षात त्यांच्या तसबिरीसह ही माहिती तर आहेच, पण लेनिनचा फोटोदेखील आहे. मला हे लक्षणीय आणि महत्वाचे वाटते. हाच भारताचा भाव आणि स्वभाव आहे.
- श्रीपाद कोठे
नागपूर
सोमवार, ११ जून २०१८

बंगदेशी २


कोलकात्याच्या मेट्रो प्रवासाचा एक धडा `जतीन पार्क’ स्थानकावर परतल्यावर मिळाला. आपण मेट्रो प्रवासाचे टोकन घेतो आणि फलाटावर जातो त्यावेळी ते टोकन आत जाण्याच्या मार्गावर असलेल्या खोक्यावर टेकवावे लागते. त्याशिवाय त्या स्वयंचलित व्यवस्थेतून आत जाताच येत नाही. तुम्ही टोकन खोक्यावर टेकवले की मधला अडथळा दूर होतो आणि आत जाण्याचा मार्ग मोकळा होतो. प्रवास संपवून स्थानकाच्या बाहेर पडताना त्या प्रवासाचे टोकन बाहेर पडण्याच्या मार्गावरील खोक्यात टाकायचे म्हणजे अडथळा दूर होतो आणि मार्ग मोकळा होऊन बाहेर येता येते. जाताना तर व्यवस्थित गेलो, पण जतीन पार्कला परतल्यावर मी टोकन खोक्यात टाकले तरीही मार्ग काही खुला होत नव्हता. तीन चारदा असे झाल्यावर एक माणूस लगेच जवळ आला. त्याचा पहिलाच प्रश्न होता - `कहां घूम रहे थे इतनी देर?’ गडबड अशी झाली होती की, जाताना घेतलेले टोकन श्यामबाजार स्थानकावर मी खोक्यात टाकलेच नाही. कारण ती पद्धतच परिचयाची नव्हती. तरीही बाहेर कसा पडलो कोणास ठाऊक. कदाचित गर्दीत समोरच्या व्यक्तीच्या पाठोपाठ बाहेर निघून गेलो असेन किंवा काही तांत्रिक कारण किंवा आणखीन काही. नेमके नाही सांगता येणार. मात्र बाहेर पडलो एवढे खरे. त्यामुळेच परत येताना जवळ दोन टोकन होते. एक जातानाच्या प्रवासाचे अन एक येतानाच्या प्रवासाचे. मी जे टोकन खोक्यात टाकत होतो ते जातानाच्या प्रवासाचे होते त्यामुळे स्वयंचलित यंत्रणा ते स्वीकारित नव्हती, फेटाळून लावत होती. तो माणूस जवळ येऊन जेव्हा विचारू लागला - `आतापर्यंत कुठे फिरत होता?’ तेव्हा त्याचे लक्ष माझ्या हातातील दुसऱ्या टोकनकडे गेले. मला नाही पण त्याला गडबड लक्षात आली. तो म्हणाला - `ते टोकन टाका.’ मी दुसरे टोकन टाकले आणि मार्ग खुला झाला. तेव्हा कुठे सगळी रचना स्पष्ट झाली. मी फुकट प्रवास केलेला नाही याची त्या माणसाला खात्री झाली आणि मला समाधान !! मग दोन मिनिटे त्या व्यक्तीशीही बोललो. लोकांनी मेट्रोचा गैरवापर करू नये, छान वातानुकुलीत वातावरणात फिरून येणे, टाईमपास करणे वा अन्य गैरप्रकार टाळण्यासाठी ही व्यवस्था. विशिष्ट वेळेपर्यंतच ते परत स्वीकारले जाते. अन्यथा ती स्वयंचलित व्यवस्था ते नाकारते आणि तुम्ही पकडले जाता. त्यामुळे कोणीही अवैधपणे प्रवास करू शकत नाही.
कोलकाता ज्या देवीसाठी प्रसिद्ध आहे किंवा ज्या देवीमुळे कोलकाता ओळखले जाते, ती काली कलकत्तेवाली म्हणजे कालीघाटावरील मां काली. येथे मात्र दक्षिणेश्वरच्या एकदम विरुद्ध. देवाचा बाजार, भक्तीचा बाजार, पंडे आणि पंच मकराची तंत्रसाधना. अर्थात हे तांत्रिक प्रकार मंगळवार, शनिवार, अमावास्या या दिवशीच. परंतु पंडे वगैरे दररोज. मी देवळानजीक गेलो तर एक खेटलाच. तो खेटला तर मीही खेकसलो. तो कालीचा पंडा असेल तर मीही कालीचा भक्त होतोच ना? त्याला कशाची भीती आणि क्षिती नव्हती तर मला तर कशाचीच भीती अन क्षिती नव्हती. त्याला टिपेच्या स्वरातच सांगितले- मला कोणतीही पूजाबिजा करायची नाही. फक्त दर्शन करायचे. हात जोडायचे अन निघायचे आहे. मग तो बाजूला झाला अन अजीजीने म्हणाला- `फुल तो लीजिये चढाने के लिए.’ त्याला हरकत असण्याचे कारण नव्हतेच. कोणत्या तरी फुलवाल्याकडून टोपली घ्यायची तर त्याचे कमिशन असलेल्या फुलवाल्याकडून घेऊ. त्याने काही बिघडत नाही. टोपली घेतली. त्यानेच ती धरली. आवारात गेलो. त्याच्याकडे टोपली मागितली तेव्हा म्हणाला- `बहुत देर लगेगी. लाईन देख रहे है ना? दो घंटे तो लगना ही है.’ मनातल्या मनात हसलो. म्हटले - `माई, मीही थोडंबहुत जग पाहिलं आहे हे तुझ्या या पंड्याला सांगितलं नाहीस का?’ अन प्रकटपणे त्याला सांगितलं- `मुझे पैसे देकर कोई भी स्पेशल दर्शन वगैरे नही करना. जितना समय लगेगा लगने दो. बहुत ही ज्यादा देर होगी तो बाहर से ही प्रणाम करके निकल जाउंगा. मां मेरे मन मे बसती है.’ पण तो सामान्य माणूस नव्हता, पंडा होता. आपल्याला पटो न पटो, आवडो न आवडो; त्याच्या बिचाऱ्याचा पोटाचा प्रश्न होता. माझ्या उत्तरावर तो घोटाळला पण दोन पावले चालल्यावर पुन्हा तेच - `समय बहुत लगेगा. देर होगी.’ ४-५ वेळा असा दोन दोन पावलांचा प्रवास झाला. अखेर त्याला म्हटले - `आप ही चढा देना फुल. मै चला. हो गया मेरा दर्शन.’ अखेरीस त्याने टोपली माझ्या हाती दिली आणि माघार घेऊन परतला. रांगेत लागलो. त्याने म्हटल्याप्रमाणे दोन तास लागले नाहीत. पंधरा मिनिटात दर्शन, प्रणाम करून बाहेर. सारदा मां भक्तांना नेहमी सांगत असत- `ती जगन्माता सत आणि असत, विद्या आणि अविद्या, चांगले आणि वाईट; अशा साऱ्याचीच आई आहे.’ प्रणाम करताना हेच मनात घोळत होते.
कोलकाता... अवाढव्य पसरलेले महानगर. कधीकाळी भारताची राजधानी असलेले. साधारण दोन कोटीपर्यंत लोकसंख्या पोहोचलेली. कसे आहे हे ऐतिहासिक शहर? बंगाली लोकांमध्ये अतिशय लोकप्रिय असलेल्या `मुडी’सारखे. मुडी म्हणजे मुरमुरे. बंगाली माणसाने दिवसातून एकदातरी मुडी खाल्लीच पाहिजे. अन मुरमुरे कशासोबत खायचे? कशाहीसोबत. मिठाईपासून पाण्यापर्यंत काहीही चालतं मुडीसोबत. अन त्याचा `कच्चा चिवडा’ केला की ती होते `झालमुडी.’ कोलकाता या झालमुडीसारखं आहे. खूप साऱ्या गोष्टी मिसळलेलं. या शहरातले रस्ते मोठे आहेत. बहुतेक सगळीकडे पदपथ आहेत. अन क्वचित अपवाद वगळले तर कोलकात्याचा माणूस पदपथाचाच वापर करतो. याचा अर्थ पदपथ खूप छान, देखणे, स्वच्छ, नीटनेटके असतातच असे नाही. एखादं तरी बिऱ्हाड थाटलेलं नाही किंवा एखादं तरी दुकान नाही असा पदपथ सापडणे कठीण. परंतु कोलकात्याचा माणूस या दुकानातून किंवा बिऱ्हाडातून मार्ग काढतो पण वापरतो पदपथच. एखादी खानावळ आहे. लोक जेवत आहेत आणि जाणारे त्यांच्या मधून जात आहेत हे सहज पाहायला मिळेल. आपल्याला कचऱ्यातूनच चालावे लागेल असे नाही, पण मधेमधे त्यातूनही मार्ग काढावा लागेलच. पदपथावर पाण्याचा नळ धोधो वाहतो आहे, त्यात कोणी गाडी धुतो आहे, कोणी आंघोळ करतो आहे, कोणी कपडे धुतो आहे; यात कोणीही आश्चर्य वाटून घेत नाहीत. अन नळाची धार आपल्या घरच्या नळाच्या धारेपेक्षा दहापट तरी मोठी. अगदी मॉड मुलीदेखील नाकातोंडाला रुमाल वगैरे न लावता सहजपणे या पदपथांवरून जात असतात.
नवीन नवीन भागांमध्ये मात्र हे चित्र बदलते आहे. परंतु कोलकाता अजूनही जुन्या काळातच असल्यासारखे आहे. मुंबईसारखे राजकीय, आर्थिक, विदेश व्यवहार, मनोरंजन, उद्योग, गुन्हेगारी असे बहुविध पैलू कोलकात्याला नाहीत. हे फक्त वाढते आहे पण त्यामुळे त्याला फार बदलावे लागते असे नाही. दोन कोटीपर्यंत लोकसंख्या पोहोचली तरी हजार- पाच हजार लोकसंख्येच्या गावातल्यासारखी दुकाने तेथे पाहायला मिळतील. अन लोक अशा दुकानातून खरेदीही करीत असतात. अंतरामुळे जाण्यायेण्याला वेळ लागतो हे खरे असले तरी, येथील माणूस घाईत नसतो. माणसे उगाच धावताहेत असे दिसत नाही. एवढी लोकसंख्या असूनही गर्दी अशी नसते. धक्काबुक्की नसते. तुम्ही गर्दीने लोटले जात नाही. चालणे किंवा उभे राहणे तुम्ही तुमच्या मर्जीने करू शकता. शेअरिंग ऑटोरिक्षा, चार-पाच बससेवा, taxis, मेट्रो, स्वत:चे वाहन असे अनेक पर्याय उपलब्ध आहेत. मेट्रो विशिष्ट मार्गावरच उपयोगाची. शेअरिंग ऑटोरिक्षा ठराविक मार्गांवर, विशिष्ट भागापुरतेच चालतात. बस आणि taxi मात्र सहज आणि कुठूनही कुठेही जातात. अजूनही ९० टक्के taxis काळ्यापिवळ्या ambassador गाड्याच. आता आता पांढऱ्या-निळ्या वेगळ्या मॉडेलच्या गाड्या आल्या आहेत. पण त्या फार थोड्या. संख्येने थोड्या असल्या तरीही नवीनपणामुळे आपला दर्जा वरचा आहे असा गंड त्यांच्यात आहे. वागणे, पैसे, लुटारूवृत्ती यातून हा गंड अनुभवास येतो. ट्रामचे रूळ अजूनही बघायला मिळतात. ट्राम मात्र बहुतेक बंद झाल्या आहेत. यापूर्वी ट्राम प्रवासाचा अनुभव घेतल्याने त्याची रुखरुख वाटली नाही.
अन्य महानगरांप्रमाणे दमट हवामान आणि त्यामुळे भरपूर घाम हे कोलकात्याचेही वैशिष्ट्य. फरक हा की कितीही वेळा आंघोळ करण्यासाठी पाणी मात्र उपलब्ध. पाण्याची कमतरता नाही. बंगाल सुजलाम आहेच. अन सुफलाम सुद्धा. फळे आणि फुले भरपूर. शिवाय विविध प्रकारची. ताजी अन रसरशीत. झाडे वगैरे बऱ्यापैकी. अगदीच रखरखीत नाही. जा-ये करणे अन्य महानगरांच्या तुलनेत स्वस्त आहे तसेच खाणेही अन्यत्रच्या तुलनेत स्वस्त. गोड तर बंगाल्यांच्या आवडीचे. अगदी पाच-दहा रुपयाची मिठाई घेऊन, खाऊन पुन्हा कामाला लागणे हे सहज पाहायला मिळणारे. छोटी वा मोठी दुकाने. अन मारुती van वा तत्सम छोट्या गाड्या मिठाई विकताना पाहायला मिळतात. तिथेच खाण्यासाठी स्थानिक माणसाने मिठाई घेतली तर त्याला पारंपरिक पानाच्या द्रोणात मिठाई मिळणार अन गिऱ्हाईक स्थानिक नसेल तर थर्माकोल अथवा अन्य पदार्थाच्या आधुनिक द्रोणात मिठाई मिळेल. पोहे वगैरे नाही मिळणार. दक्षिणी पदार्थही कमीच. समोसे मात्र भरपूर खातात. त्यांना समोसे मात्र म्हणायचे नाही. त्यांना म्हणायचे शिंगाडे. पुरीभाजी म्हणजे लुची. पत्ता, रस्ता वगैरे सांगायला सगळे बहुतेक तयारच असतात. कोणी कुरकुर करत नाहीत. जागोजागी पोलीस भरपूर असतात. तेही मदत करतात. अन फसवणूक हा माणसाचा गुण असला तरीही त्याचे प्रमाण कमी. रात्री बेरात्री भीती फारशी नाही. हां राजकीय गुन्हेगारी हा मात्र स्वतंत्र विषय.
मोठाल्या हवेल्या अजूनही सगळीकडे पाहायला मिळतात. सदनिका आहेतच पण महानगराच्या मानाने कमी. कोलकाता अजूनही मोठ्या प्रमाणात स्वतंत्र घरांमध्ये राहते. पारंपरिक बंगाली पेहेरावातील स्त्री पुरुष मात्र आता शोधावेच लागतात. पूजा वगैरेच्या निमित्तानेच ते पाहायला मिळतात. छोट्या मोठ्या कामांच्या आणि व्यवसायाच्या निमित्ताने बिहारी लोक कोलकात्यात आलेले मोठ्या प्रमाणात सापडतात. बंगाली हीच मूळ आणि प्रधान भाषा. परंतु हिंदीला विरोध वा आकस नाही. समजलीही मोठ्या प्रमाणावर जाते.
- श्रीपाद कोठे
नागपूर
सोमवार, ४ जून २०१८